आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)
Anandamath with Vande Mataram - Bankim Chandra
बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशर्म से अपने पति का हिस्सा लाकर थाली मे डाल दिया। जीवानंद ने सब ख्याल छोड़कर उस स्वादिष्ट भोजन
को भी उदर नामक महागर्त मे भर लिया। अब निमाई ने पूछा-“दादा! और कुछ खाओगे?”
जीवानंद ने डकार लेते हुए कहा-“और क्या है?”
निमाई बोली-“एक पक्व कटहल है।” निमाई ने कटहल भी ला रखा। विशेष कोई आपत्ति न कर जीवानंद
गोस्वामी ने उसे भी ध्वंसपुर भेज दिया। अब हंसकर निमाई ने पूछा-“दादा! और कुछ नही?”
दादा ने कहा-“अब रहने दे फिर किसी दिन आकर खाऊंगा।”
अंत मे निमाई ने दादा को हाथ-मुंह धोने को पानी दिया। जल ढालते हुए निमाई ने पूछा-“दादा! मेरी एक
बात रख लोगे?”
जीवानंद-“क्या?”
निमाई-“तुम्हे मेरी कसम!”
जीवानंद-“अरे बोल न कलमुंही”
निमाई-“बात रक्खोगे?”
जीवानंद-“अरे पहले बता भी तो सही।”
निमाई-“तुम्हे मेरी कसम, हाथ जोड़ती हूं।”
जीवानंद-“अरे बाबा मंजूर है! बता तो सही, क्या कहती है?”
अब निमाई गर्दन टेढ़ी कर एक हाथ से दूसरे हाथ की ऊंगली तोड़ती हुई, शर्माती हुई, कभी नीचे जमीन
देखती हुई बोली-“ एक बार भाभी को बुला दूं, मुलाकात कर लो।”
जीवानंद ने हाथ धुलाने वाले लोटे को निमी पर मारने के लिए उठाया, फिर बोले-“लौटा दे, मेरी लड़की!
तेरा अन्न भी किसी दिन वापस कर जाऊंगा। तू बंदरी है, कलमुंही है। तुझे जो बात न कहनी चाहिए, वही बात
मेरे सामने कहती है।”
निमी बोली-“अच्छा मैं ऐसी ही सही पर भैया! एक बार कह दो, मैं भाभी को बुला लाऊं।”
जीवानंद-“तो लो मैं जाता हूं।”
यह कहकर जीवानंद उठकर द्वार की तरफ बढ़े। किंतु शीघ्रता-पूर्वक निमाई ने दौड़कर किवाड़ बंद कर दिए
और स्वयं किवाड़ से लगकर खड़ी हो गई। बोली-“मुझे मारकर ही बाहर जा सकते हो, भैया! आज भाभी से
बिना मुलाकात किए जाने न पाओगे।”
जीवानंद बोले-“जानती है, आदमियो का शिकार करना ही मेरा काम है। मैंने अनेक आदमियो का शिकार
किया है।”
अब निमी भी क्रोध मे आई। बोली-“खूब किया! अपनी पी का त्याग कर दिया और आदमियो की जान
ली। क्या समझते हो, इससे मैं मान जाऊंगी? बहुत करोगे मारोगे, लेकिन मैं डरनेवाली नही हूं! तुम जिस बाप
के लड़के हो, मैं भी उसी बाप की लड़की हूं। आदमियो का खून करने मे यदि बड़ाई की बात हो, तो मुझे भी
मारकर बड़ाई प्राप्त करो।”
जीवानंद हंसकर बोले-“अच्छा बुला ला- किस पापिनी को बुलाएगी-जा बुला! लेकिन देख आज के बाद
कहेगी तो उस साले के भाई व साले को सिर मुंडाकर गदहे पर चढ़ाकर गांव के बाहर निकलवा दूंगा।”
निमी ने मन ही मन सोचा-“हुई न मेरी जीत यह सोचती हुई वह घर के बाहर निकल गई। इसके बाद पास
ही एक झोपड़ों में वह जा घुसी। कुटी मे सैंकड़ो पैबन्द लगे हुए कपड़े पहने, रुक्ष-केशी एक युवती बैठी