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आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)

आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)

Anandamath with Vande Mataram - Bankim Chandra

बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा

DevanagariHindipublished78 पृष्ठ

पृष्ठ 22, कुल 78 में से

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पृष्ठ 22

कल्याणी-“कहां मुझे ले जाते?- कहां स्थान है? मां-बाप, सगे-संबंधी सब इस दुर्दिन मे चले गए है।
किसके घर मे जगह है, कहां जाने का विचार है? कहां ले जाओगे? मैं कालग्रह हूं- मैने मरकर अच्छा ही
किया है ! मुझे आशीर्वाद दो, मैं उस आलोकमय लोक मे जाकर तुम्हारी प्रतीक्षा मे रहूं और फिर तुम्हे पाउं।”
यह कहकर कल्याणी ने फिर स्वामी का पदरेणु ग्रहण किया। महेंद्र कोई उत्तर न देकर रोते ही रहे। कल्याणी
फिर अति मृदु, अति मधुर, अतीव स्नेहमय कंठ से बोली-“देखो, देवताओं की इच्छा, किसकी मजाल है कि
उसका उल्लंघन कर सके ! मुझे जाने की आज्ञा उन्होने दी है, तो क्या मैं किसी तरह भी रुक सकती हूं? मैं स्वयं
न मरती तो कोई मार डालता ! मैं ने आत्महत्या कर अच्छा ही किया है। तुमने देशोद्धार का जो व्रत लिया है, उसे
तन-मन-धन से पूरा करो- इसी मे तुम्हे पुण्य होगा- इसी पुण्य से मुझे भी स्वर्गलाभ होगा। हम दोनो ही
साथ-साथ अक्षय स्वर्गसुख का उपभोग करेंगे।”
इधर बालिका एक बार दूध की उल्टी कर सम्भलने लगी। उसके पेट मे जिस परिमाण मे विष गया था, वह
घातक नही था। लेकिन महेंद्र का ध्यान उस समय उधर न था। उन्होने कन्या को कल्याणी की गोद मे दे दोनो
का प्रगाढ़ अलिंगन कर फूट-फूटकर रोना शुरू किया। उसी समय वन मे से मधुर किंतु मेघ-गंभीर शब्द सुनाई
पड़ने लगा-
“हरे मुरारे मधुकैटभारे !
गोपाल गोविंद मुकुंद शौरे !”
उस समय कल्याणी पर विष का प्रभाव हो रहा था, चेतना कुछ लुप्त हो चली थी। उन्होने अवचेतन मन से
सुना, मानो वैकुण्ठ से यह अपूर्व ध्वनि उभरकर गूंज रही है-
“हरे मुरारे मधुकैटभारे !
गोपाल गोविंद मुकुंद शौरे !”
तब कल्याणी ने अप्सरानिंदित कंठ से बड़े ही मोहक स्वर मे गाया-
“हरे मुरारे मधुकैटभारे !”
वह महेंद्र से बोली- “कहो हरे मुरारे मधुकैटभारे !”
वन मे गूंजने वाले मधुर स्वर और कल्याणी के मधुर स्वर पर विमुग्ध होकर कातर हृदय से एक मात्र ईश्वर
को ही सहाय समझाकर महेंद्र ने भी पुकारा-
“हरे मुरारे मधुकैटभारे !”........
तब मानो चारो तरफ से ध्वनि होने लगी--
“हरे मुरारे मधुकैटभारे !”.......
और मानो वृक्ष के पत्तो से भी आवाज निकलने लगी-
“हरे मुरारे मधुकैटभारे !”.......
नदी के कलकल ध्वनि मे भी वही शब्द हुआ-
“हरे मुरारे मधुकैटभारे !”.......
अब महेंद्र अपना शोक संताप भूल गए, उन्मत्त होकर वे कल्याणी के साथ एक स्वर से गाने लगे-
“हरे मुरारे मधुकैटभारे !”.......
जंगल मे से भी उसके स्वर से मिली हुई वाणी निकली-
“हरे मुरारे मधुकैटभारे !”.......
कल्याणी का कंठ क्रमशः क्षीण होने लगा, फिर भी वह पुकार रही थी-