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आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)

आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)

Anandamath with Vande Mataram - Bankim Chandra

बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा

DevanagariHindipublished78 पृष्ठ

पृष्ठ 75, कुल 78 में से

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पृष्ठ 75

आह्वान करता है। उस चांदनी रात मे श्याम भूमि लाल वसन पहनकर भयानक हो गई थी। किसकी हिम्मत थी
कि वहां जाता?
साहस तो किसी का नही है लेकिन उस निस्तब्ध भयंकर रात मे भी एक रमणी उस अगम्य रणक्षेत्र मे विचरण
कर रही है। वह एक मशाल लिए रणक्षेत्र मे किसी को खोज रही है- हरेक शव का मुंह रोशनी मे देखकर दूसरे
के पास चली जाती है। कही कोई मृत देह अश्व के नीचे पड़ी है, तो वही मुश्किल से मशाल रख, दोनो हाथो
से अश्व को हटाकर शव देखती और हताश हो आगे बढ़ जाती है। वह जिसे खोज रही थी, उसे न पाया। अब
वह मशाल छोड़, रक्तमय जमीन पर पछाड़ खा गिरकर रोने लगी। पाठको ! यह शांति है वीर जीवानंद के शव को
खोज रही है।
शांति जिस समय जमीन पर गिरकर रो रही थी, उसी समय उसे एक मधुर करुण शब्द सुनाई पड़ा-‘‘उठो,
बेटी!, रोओ नही !‘‘ शांति ने देखा, चांदनी रात मे सामने एक जटाजूटधारी विराट महापुरुष खड़े है।
शांति उठकर खड़ी हो गई ! जो आए थे, उन्होने कहा-‘‘रोओ नही, बेटी ! जीवानंद शांति ने पहचाना-वह
जीवानंद की देह थी। सर्वांग क्षत-विक्षत, रुधिर से सने हुए थे। शांति यह कहकर वे महापुरूष शांति को रणक्षेत्र
के मध्य मे ले गए। वही शवो का एक स्तूप लगा हुआ था। शांति उसे हटा न सकी थी। उस महापुरुष ने स्वयं
शवो को हटाकर एक शव बाहर निकाला। शांति ने पहचाना- वह जीवानंद की देह थी। सर्वांग क्षत-विक्षत रुधिर
से सने हुए थे। शांति सामान्य स्त्री की तरह जोरो से रो पड़ी !‘‘
महापुरुष ने फिर कहा-‘‘रोओ नही बेटी! क्या जीवानंद मर गए है ? शांत होकर उनका शरीर देखो, नाड़ी की
परीक्षा करो !‘‘
शांति ने शव की नाड़ी देखी, नाड़ी का पता न था। वे बोले-‘‘छाती पर हाथ रखकर देखो !‘‘
शांति ने छाती पर हाथ रखकर देखा, गतिहीन ठंडा था !
फिर महापुरुष ने कहा-‘‘नाक पर हाथ रखकर देखो, कुछ भी श्वास नही है?‘‘
शांति ने देखा, किंतु हताश हो गई।
महापुरुष ने फिर कहा-‘‘मुंह मे उंगली डालकर देखो, कुछ गरमी मालूम पड़ती है?‘‘
आशामुग्धा शांति ने वह भी किया, बोली-‘‘मुझे कुछ पता नही लगता है !‘‘
महापुरुष ने बायां हाथ शव पर रखकर कहा-‘‘बेटी, तुम घबरा गई हो। देखो अभी देह मे हलकी गरमी है !‘‘
अब शांति ने फिर नाड़ी देखी- देखा कि मन्द, अतिमन्द गति है। विस्मित होकर उसने छाती पर हाथ रखा-
मृदुधड़कन है। नाक पर हाथ रखकर देखा- हल्की सांस है। शांति ने विस्मित होकर पूछा-‘‘क्या प्राण था? या
फिर से आ गया है?‘‘
उन्होने कहा-‘‘भला ऐसा कभी हुआ है, बेटी! तुम इन्हे उठाकर तालाब के किनारे तक ले चल सकोगी? मैं
चिकित्सक हूं, इनकी चिकित्सा करूंगा !‘‘
शांति जीवानंद को तालाब पर ले जाकर घाव धोने लगी। इसी समय उन महापुरुष ने लता आदि का प्रलेप
लाकर घावो पर लगा दिया। इसके बाद वे जीवानंद का शरीर सहलाने लगे। अब जीवानंद के श्वास-प्रश्वास तेज
हो गए। कुछ ही क्षण मे उठ बैठे। शांति के मुंह की तरफ देखकर उन्होने पूछा-‘‘युद्ध मे किसकी विजय
हुई?‘‘
शांति ने कहा-‘‘तुम्हारी विजय ! इन महात्मा को प्रणाम करो?‘‘
अब दोनो ने देखा कि वहां कोई नही है, किसे प्रणाम करे !
समीप ही संतान-सेना का विजयोल्लास सुनाई पड़ रहा था। लेकिन शांति या जीवानंद मे से कोई भी न उठा।