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आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)

आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)

Anandamath with Vande Mataram - Bankim Chandra

बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा

DevanagariHindipublished78 पृष्ठ

पृष्ठ 62, कुल 78 में से

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पृष्ठ 62

ही एक तरफ से हेनरी ने और दूसरी तरफ से वाटसन ने उन्हे घेर लिया। अब सिवा युद्ध के परित्राण न था। इधर
सेना भग्नोत्साह थी।
इसी समय टॉमस की तोपे पास आ पहुंची। अब सन्तानो का दल छिन्न-भिन्न होने लगा। उन्हे प्राण-रक्षा की
कोई आशा न रही। जिसे जिधर राह मिली, भागने लगा। जीवानन्द और धीरानन्द ने उन्हे बहुत संयत करने की
चेष्टा की, लेकिन कोई फल न हुआ, संतानो का दल तितर-बितर होने लगा। इसी समय ऊंची आवाज मे सुनाई
दिया - ‘‘पुल पर जाओ, पुल पर जाओ ! उस पार चले जाओ, अन्यथा नदी मे डूब मरोगे।‘‘ अंगरेजो की सेना
की तरफ मुंह किये हुए पुल पर चले जाओ !
जीवानन्द ने देखा कि कहनेवाले भवानंद सामने है। भवानन्द ने कहा,-‘‘जीवानन्द, तुम सेना को पुल पर ले
जाओ। दूसरे प्रकार से रक्षा नही है।‘‘ यह सुनते ही संतान-सेना क्रमशः पुल पर पहुंचने लगी। थोड़ी ही देर मे
समूची संतान-सेना पुल पर जा पहुंची। भवानन्द, जीवानन्द धीरानन्द सब एकत्र थे। भवानन्द ने जो कुछ कहा
था, वही हुआ। अंगरेजो की तोपे पुल के मुंह पर लगी थी और वे गोले उगलने लगी। भयानक संतान-क्षय
होने लगा। यह देखकर भवानन्द ने कहा - ‘‘जीवानन्द ! यह एक तोप हमारा नाश कर डालेगी ! क्या देखते हो,
जाओ हम तीनो उस पर टूटकर अधिकार ले।‘‘
भवानंद के यह कहते ही जय नाद उठा -‘‘वन्देमातरम् !‘‘ और उसी समय तीन तलवारे पुनः सिरो पर घूम
उठी। तोपची तमाशा ही देखते रह गये। हेनरे और वास्टन दूर खड़े अहंकार और प्रसन्नता मे इसे खिलवाड़
और मूर्खता समझते रहे। किन्तु इसी समय रण का पास पलट गया। पलक मारते ही तीनो सन्तान-नायक
तोपचियो पर जा पड़े। तोपचियों के सिर धड़ से कब जुदा हुए कुछ पता नही। उनकी मोह-निद्र टूटी तब, जब
बिजली की तरह तलवार चमकाते हुए भवानन्द स्वयं तोप पर खड़े हो गये और बोल -‘‘वन्देमातरम् !‘‘ सहस्रो
कंठो से निकला -‘‘वन्देमातरम् !‘‘ उसी समय जीवानन्द ने तोप का मुंह अंगरेजी सेना की तरफ कर दिया और
तोप प्रति-क्षण आग उगलने लगी। अब भवानंद ने कहा - ‘‘जीवानंद भाई ! यह क्षणिक जीत है, अब तुम
संतानो को लेकर सकुशल पार चले जाओ। केवल बीस तोप भरनेवाले और मृत्यु का वरण करनेवाले संतानो
को तोप की रक्षा के लिए छोड़ दो।‘‘
ऐसा ही हुआ। बीस संतान तोप के इर्द-गिर्द आ डटे। शेष समूची सेना जीवानन्द और धीरानन्द के साथ पार
पहुंचने लगी। उस समय भवानंद क्रुद्ध गजराज हो रहे थे। पुल की संकरी जगह पर तोप लगाकर वे लगे गोरी
वाहिनी का नाश करने। दल-के-दल तोप छीनने के लिए आगे बढ़ते थे और मरकर ढेर बन जाते थे। उस समय
वे बीस युवक अजेय थे। ये लोग शीघ्रता इसलिए कर रहे थे कि अंगरेजो की शेष तोपे पहुंचने के पहले तक
ही यह सारी अजेय लीला है। लेकिन भगवान को तो कुछ और ही करना था। एकाएक जंगल के अन्दर से
बहुत-सी तोपो का गर्जन सुनाई पड़ने लगा। दोनो ही दल अवाक-रिस्पन्द होकर देखने लगे कि ये किसकी
तोपे है?
थोड़ी ही देर मे लोगो ने देखा कि जंगल के अन्दर से महेन्द्र की सत्रह तोपे, तीन तरफ से घेरा, बांधे हुए
आग उगलती चली आ रही है। अंगरेजो की उस देशी फौज मे महामारी आ गयी- दल-के-दल साफ होने
लगे। यह देख शेष यवन-सिपाही भागने लगे। उधर जीवानंद और धीरानन्द ने भी जैसे ही वातावरण समझा,
वैसे ही उनका सारा क्रोध पलट पड़ा और पलट पड़ी सन्तान-सेना। वे भागती हुई यवन-सेना को घेरने और
मारने लगे। अवशिष्ट रह गये यही कोई तीस-चालीस गोरे। वह वीर जाति वैसे ही डटी रही। अब भवानन्द ने उन
पर धावा बोलने के लिए हाथ उठाया ही था कि जीवानन्द ने कहा - ‘‘भवानन्द ! महेन्द्र की कृपा से पूर्ण रण-
विजय हुई है; अब व्यर्थ इन्हे मारने से क्या फायदा? चलो लौट चले।‘‘

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