आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)
Anandamath with Vande Mataram - Bankim Chandra
बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशांति-‘'यह कमरा सब कमरो से उत्तम है ।‘‘
गोवर्द्धन-‘'भला यह कमरा ऐसा न होगा !‘‘
शांति-‘'क्यो ?‘‘
गोवर्द्धन- ‘'जीवानंद स्वामी इसमे रहते है न !‘‘
शांति-‘'मै इसी मे रह जाती हूं, वह कोई दूसरा कमरा खोज लेगे ।‘‘
गोवर्द्धन-‘'भला ऐसा भी हो सकता हैं? जो इस कमरे मे रहते है, उन्हे चाहे मालिक समझिये, या जो चाहे
समझिए- जो कहते है, वही होता है ।‘‘
शांति-‘'अच्छा तुम जाओ, मुझे यदि जगह न मिलेगी तो पेड़ के नीचे पड़ी रहूंगी !‘‘
यह कहकर गोवर्द्धन को बिदा कर शांति उसी कमरे मे घुसी ! कमरे मे घुसकर शांति जीवानंद का
कृष्णाजिन बिछाकर और दीपक तेज कर उनकी रखी एक किताब पढ़ने लगा।
कुछ देर बाद जीवानंद उपस्थित हुए ! शांति का यद्यपि पुरुष वेश था, फिर भी उन्होने आते ही पहचान लिया,
बोले-‘'यह क्या? शांति ?‘‘
शांति न धीरे-धीरे पुस्तक रखकर जीवानंद के चेहरे की तरफ देखकर कहा-‘'महाशय ! शांति कौन है ?‘‘
जीवानंद भैंचक्के से रह गए, अंत मे बोले-‘'शांति कौन है? क्यो, क्या तुम शांति नही हो ?‘‘
शांति उपेक्षा के साथ बोली-‘'शांति कौन है? क्यो, क्या तुम शांति नही हो ?‘‘
शांति उपेक्षा के साथ बोली- ‘‘मै नवीनानंद स्वामी हूं ।‘‘
यह कहकर वह फिर पुस्तक पढ़ने लगी।
जीवानंद खखाकर हंस पड़े, बोले-‘'यह नया तमाशा बढ़िया है ! अच्छा श्री श्री नवीनानंद जी ! क्या सोचकर
यहां पहुंच गए ?‘‘
शांति बोली-‘'यह नया तमाशा बढ़िया है ! अच्छा भले आदमियो मे रिवाज है कि पहली मुलाकात मे
‘आप’-‘श्रीमान’-‘महाशय’ आदि शब्दो से संबोधन करना चाहिए। मै भी आपसे असम्मान-जनक रूप मे बाते
नही करता हूं। तब आप मुझे ‘तुम-तुम’ क्यो कहते है ?‘‘
‘‘जो आज्ञा‘‘-कहकर गले मे कपड़ा डालकर हाथ जोड़कर जीवानंद ने कहा- ‘‘अब विनीत भाव से
भृत्य का निवेदन है, कि किस कारण भैरवीपुर से इस दीन-भवन मे महाशय का शुभागमन हुआ है? आज्ञा
किजिए !‘‘
शांति ने अति गंभीर भाव से कहा-‘'व्यंग्य की कोई आवश्यकता नही है। मै भैरवीपुर को पहचानता ही
नही। मै संतानधर्म ग्रहण करने के लिए आज आकर दीक्षित हुआ हूं ।‘‘
जीवानंद-‘'अरे सर्वनाश ! क्या सचमुच ?‘‘
शांति-‘'सर्वनाश क्यो ? आप भी तो दीक्षित है !‘‘
जीवानंद-‘'तुम तो स्त्री हो !‘‘
शांति-‘'यह कैसे? ऐसी बात आपने कैसे सुनी ?‘‘
जीवानंद-‘'मेरा विश्वास था कि मेरी ब्राह्मणी? स्त्री है !?‘‘
शांति-‘'ब्रह्यणी? है या नही ?‘‘
जीवानंद-‘'थी तो जरूर !‘‘
शांति-‘'आपको विश्वास है कि मै आपकी ब्राह्मणी हूं ?‘‘
जीवानंद ने फिर गले मे कपड़ा डालकर बड़े ही विनीत भाव से कहा-‘'अवश्य महाशयजी !‘‘