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सर्वकोश
आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)

आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)

Anandamath with Vande Mataram - Bankim Chandra

बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा

DevanagariHindipublished78 पृष्ठ

पृष्ठ 42, कुल 78 में से

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पृष्ठ 42

पैर छूकर महेन्द्र के विदा होने पर, उनके संग उसी दिन जो दूसरा शिष्य दीक्षित हुआ था, उसने आकर सत्यानन्द
को प्रणाम किया। सत्यानन्द ने उसे आशीर्वाद देकर बैठाया। इधर-उधर की मीठी बाते होने के बाद स्वामीजी ने
कहा- "क्योजी, भगवान कृष्ण मे तुम्हारी प्रगाढ़ भक्ति है या नही!"
शिष्य ने कहा- "कैसे बताऊं? मैं जिसे भक्ति समझता हूं, शायद वह भंडैती या आत्मप्रतारणा हो!"
सत्यानन्द ने सन्तुष्ट होकर कहा- "ठीक है, जिससे दिन-प्रतिदिन भक्ति का विकास हो, ऐसी ही कोशिश
करना। मैं आशीर्वाद देता हूं, तुम्हारी साधना सफल हो! कारण तुम अभी उम्र मे बहुत युवा हो। वत्स! क्या
कहकर बुलाऊं- अब तक मैने पूछा नही।"
नवसन्तान ने कहा- "आपकी जो अभिरुचि हो! मैं तो वैष्णवो का दासानुदास हूं।"
सत्यानन्द- "तुम्हारी नई उम्र देखकर तुम्हे नवीनानन्द बुलाने की इच्छा होती है, अतः तुम अपना यही नाम
रखो! लेकिन एक बात पूछता हूं, तुम्हारा पहले क्या नाम था? यदि बताने मे कोई बाधा हो, तब भी बता देना।
मुझसे कहने पर बात दूसरे कान मे न पहुंचेगी। सन्तानधर्म का मर्म यही है कि जो अवाच्य भी हो, उसे भी गुरू
से कह देना चाहिए। कहने मे कोई हानि न होगी।"
शिष्य- "मेरा नाम शान्ति देव शर्मा है।"
सत्यानन्द- "तुम्हारा नाम शान्तिमणि पापिष्ठा है।"
यह कहकर सत्यानन्द ने शिष्य की डेढ़ हाथ लम्बी काली-काली दाढ़ी को बांए हाथ से पकड़कर खींच
लिया, नकली दाढ़ी अलग हो गयी। सत्यानन्द ने कहा- "छिः बेटी! मेरी साथ ठगी? - और मुझे ही ठगना था
तो इस उम्र मे डेढ़ हाथ की दाढ़ी क्यो? और दाढ़ी तो दाढ़ी, यह कण्ठ का स्वर- यह आंखों की कोमल दृष्टि
छिपा सकती हो? मैं यदि ऐसा ही निर्बोध होता तो क्या इतने बड़े काम मे कभी हाथ डालता?"
बेशर्म शान्ति कुछ देर तक अपनी आंखो को हाथ से ढांके बैठी रही। इसके बाद ही उसने हाथ हटाकर वृद्ध
पर मोहक तिरछी चितवन डालकर कहा- "प्रभु! तो इसमें दोष ही क्या है? स्त्री के बाहुओ मे क्या बल नही
रहता?"
सत्यानन्द- "गोषपद मे जितना जल होता है!"
शान्ति- "सब सन्तानो के बाहुबल की परीक्षा कभी आपने की है?"
सत्यानन्द- "की है।"
यह कहकर सत्यानन्द एक इस्पात का धनुष और लोहे का थोड़ा तार ले आये। उसे शांति को देते हुए उन्होने
कहा- "इसी इस्पात के धनुष पर लोहे के तार की डोरी चढ़ानी होगी। प्रत्यंचा का परिणाम दो हाथ है। डोरी
चढ़ाते-चढ़ाते धनुष सीधा हो जाता है और चढ़ानेवाले को दूर फेक देता है। जो इसे चढ़ा सकता है, वही
वास्तव में बलवान है।"
शांति ने धनुष और तार को अच्छी तरह देखकर पूछा- "सभी संतान क्या इस परीक्षा मे उत्तीर्ण हुए है!"
सत्यानन्द- "नही, इसके द्वारा केवल उन लोगो के बल की थाह ले ली है।"
शांति- "क्या कोई भी इस परीक्षा मे उत्तीर्ण हो नही सका?"
सत्यानंद- "केवल चार व्यक्ति।"
शान्ति- "क्या मैं पूछ सकती हूं कि वे कौन-कौन है?"
सत्यानंद- "हां, कोई निषेध नही है- एक तो मैं स्वयं हूं।"
शांति- "और?"