आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)
Anandamath with Vande Mataram - Bankim Chandra
बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा
पृष्ठ 12, कुल 78 में से
संदर्भ में पढ़ेंबैलगाड़ी पर से कूदकर एक सिपाही की तलवार छीनकर महेंद्र सिंह ने भी चाहा कि युद्ध मे योग दे। लेकिन
इसी समय उन्हे प्रत्यक्ष दिखाई दिया कि युद्ध मे लगा हुआ दल और कुछ नही, डाकुओ का दल है-धन छीनने
के लिए इन लोगो ने सिपाहियो पर आक्रमण किया है। यह विचार कर महेंद्र युद्ध से विरत हो दूर जा खड़े हुए।
उन्होने सोचा कि डाकुओ का साथ देने से उन्हे भी दुराचार का भागी बनना पड़ेगा। वे तलवार फेककर धीरे-
धीरे वह स्थान त्यागकर जा रहे थे, इसी समय भवानंद उसके पास आकर खड़े हो गए। महेंद्र ने पूछा-
‘‘महाशय! आप कौन है?’’
भवानंद ने कहा-‘‘इससे तुम्हे क्या प्रयोजन है?’’
महेंद्र-‘‘मेरा कुछ प्रयोजन है- आज आपके द्वारा मैं विशेष उपकृत हुआ हूं।’’
भवानन्द-‘‘मुझे ऐसा नही था कि तुम्हे इतना ज्ञान है। हाथो मे हथियार रहते हुए भी तुम युद्ध से विरत
रहे..... जमीदारो के लड़के घी-दूध का श्राद्ध करना तो जानते है, लेकिन काम के समय बंदर बन जाते है!’’
भवानंद की बात समास होते-न-होते महेंद्र घृणा के साथ कहा-‘‘यह तो अपराध है, डकैती है’’
भवानंद ने कहा-‘‘ हां डकैती! हम लोगो के द्वारा तुम्हारा कुछ उपकार हुआ था, साथ ही और भी कुछ
उपकार कर देने की इच्छा है!’’
महेंद्र-‘‘तुमने मेरा कुछ उपकार अवश्य किया है लेकिन और क्या उपकार करोगे? फिर डाकुओ द्वारा उपकृत
होने के बदले अनुपकृत होना ही अच्छा है।’’
भवानंद-‘‘उपकार ग्रहण न करो, यह तुम्हारी इच्छा है। यदि इच्छा हो तो मेरे साथ आओ, तुम्हारी स्त्री-कन्या
से मुलाकात करा दूंगा!’’
महेंद्र पलटकर खड़े हो गए, बोले-‘‘क्या कहा?’’
भवानंद ने इसका कोई जवाब न देकर पैर बढ़ाया।
अंत मे महेंद्र भी साथ-साथ आने लगे, साथ ही मन-ही-मन सोचते जाते थे-यह सब कैसे डाकू है?.......
स चांदनी रात मे दोनो ही जंगल पार करते हुए चले जा रहे थे। महेंद्र चुप, शांत, गर्वित और कुछ कौतूहल मे
भी थे।
सहसा भवानंद ने भिन्न रूप रूप धारण कर लिया। वे अब स्थित-मूर्ति, धीर-प्रवृत्ति सन्यासी न रहे- वह
रणनिपुण वीरमूर्ति, अंग्रेज सेनाध्यक्ष का सिर काटने वाला रुद्ररूप अब न रहा। अभी जिस गर्वित भाव से वे
महेंद्र का तिरस्कार कर रहे थे, अब भवानंद वह न थे- मानो ज्योत्सनामयी, शांतिमयी पृथिवी की तरु-कानन-
नद-नदीमय शोभा निरखकर उसके चित्त मे विशेष परिवर्तन हो गया हो। चन्द्रोदय होने पर समुद्र मानो हंस
उठा। भवानंद हंसमुख, मुखर, प्रियसंभाषी बन गए और बातचीत के लिए बहुत बेचैन हो उठे। भवानंद ने
बातचीत करने के अनेक उपाय रचे, लेकिन महेन्द्र चुप ही रहे। तब निरुपाय होकर भवानंद ने गाना शुरू किया-
‘‘वन्दे मातरम् !
सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम्
शस्यश्यामलां मातरम्............।’’
महेंद्र गाना सुनकर कुछ आश्चर्य मे आए। वे कुछ समझ न सके- सुजलां, सुफलां, मलयजशीतलां,
शस्यश्यामला माता कौन है? उन्होने पूछा-‘‘यह माता कौन है?’’
कोई उत्तर न देकर भवानंद गाते रहे-
‘‘शुभ्रज्योत्सना पुलकित यामिनीम्
फुल्लकुसुमित द्रुमदल शोभिनीम्