अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)
Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works
अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
अशफाक उल्ला खाँ अपने नाम के आगे वारसी लगाते थे और
'हसरत' उपनाम से कविताएँ लिखा करते थे। उनकी काव्य रचना पर एक
दृष्टि देने पर ज्ञात होता है कि वे उच्च कोटि के शायर थे, शायरी पर
उनका अधिकार था। उन्होंने अच्छी गज़लें कहीं हैं, वही कत्आत, नज़्मों
में भी कम नहीं दिखते। कविता में उनकी आंतरिक वेदना, संवेदना,
भावना का पता चलता है। कुछ रचनाएँ तो दार्शनिक भाव से कही गयी
है तो कुछ आत्मलाप की मुद्रा में। उनकी रचनाओं से स्पष्ट है कि वे
सिर्फ क्रांतिकारी ही नही थे, भावुक हृदय कवि भी थे। कहीं वे सरकारी
वकील पर व्यंग्य करते हैं तो कही बसंत के आगमन की मस्ती। इस्लाम
में उनका विश्वास था लेकिन वे सभी धर्मों का आदर करते थे। यह
उनके व्यक्तित्व की खास पहचान थी। कुल मिलाकर सम्पूर्ण व्यक्तित्व
रेखांकित करने योग्य, प्रेरणा के योग्य और युवाओं के आदर्श।
अशफाक की कुछ अन्य कविताएं भी (गज़लें) रेखांकित करना
आवश्यक है, जो उनके व्यक्तित्व को (काव्य प्रतिभा) निखारता है :-
‘‘पहिनाने वाले अगर बेड़िया पहनाएँगे।
खुशी से कैद के गोशे को हम बसाएँगे।।
जो सन्तरी वीर जिन्दा के सो भी जाएँगे।
वह राग गा के उन्हें नींद से जगाएँगे।
तलब फजूल है काँटे को फूल के बदले।
न ले बहिश्त भी हस होमरूल के बदले।।
सन्तरी देख कर इस जोश को शरमाएँगे।
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राग जंजीर की झन्कार में हम गायेंगे।।¹
‘ ‘सितमगर अब यह आलम है तेरे बीमारे फुरकत का।
लबों पर दम है दिल में बलबला शौके शहादत का।।
मेरी दीवानगी पर चारागर हैरां न हो इतना।
यही अंन्जाम होना चाहिए नाकाम उलफत का।।
बुताने संग दिल सुनते नहीं फरियाद बेकस की।
निराला ढंग है उन खुदपरस्तों की हुकूमत का।।
मिटाकर जानो दिल अपना किसी जालिम जफाजू पर।
तमाशा अपनी आँखों देखता हूँ अपनी किस्मत का।।
हविस हूरों की हो जिसमें दिलाये याद गिल्मां को।
जनाबे शेख़ मैं कायल नहीं ऐसी रियाज़त का।।
बर आएँ हसरतें हासिल स्कूने कल्ब मुज़तर हो।
कहाँ ऐसा मुकद्दर हाय मुझ बरमश्ता किस्मत का।।
मज़ा जब है कि वह कह उठें ‘अशफाक’ उनका क्या कहना।
गज़ल है या मुरक्का है तेरे वक्ते मुसीबत का।।’’²
अशफाक की काव्य रचनाएँ आजादी के उद्गार हैं। यही नही वे देश
प्रेमी होने का दावा भी करते हैं। अपनी मिट्टी से प्यार की बुलन्दी छूने
वाले अशफाक ऐसे वियोगी जान पड़ते है जिसमें उनका देश प्रेम छूट रहा
है या यूँ कह ले कि वे कुछ और करना चाहते थे। अशफाक की कविताएँ
सदैव प्रेरणा देती रहेंगी और इतिहास की थाती साबित होगी।
- रामप्रसाद बिस्मिल, रचनावली, सम्पादक-दिनेश शर्मा, पृष्ठ -188
- राम प्रसाद बिस्मिल रचनावली, सम्पादक-दिनेश शर्मा, पृष्ठ -188
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अशफ़ाक़ की सम्पूर्ण शायरी (ग़ज़लें, नज्में) एवं अमर बलिदान उपसंहार
अध्याय-दस
अध्याय-दस
उपसंहार
अशफाक उल्ला खाँ का जीवन साम्प्रदायिक एकता और देश को
स्वतंत्र करने की मानसिकता में बीता। यही कारण था कि वे एक आदर्श
युवा की भाँति युवाओं में प्रेरणा के स्तम्भ बने रहे। अशफाक के बलिदान
के बाद तमाम प्रतिक्रियाएं हुई और अशफाक की भरपूर सूचना ली गयी।
वे मिसाल बन गये। यह बात और है कि अशफाक की फाँसी से युवा
वर्ग निराश जरूर हुआ लेकिन वहीं वह ऊर्जा को भरकर नये भारत की
कल्पना में आ गया।
क्रांतिकारियों को फाँसी की सजा से निराशा व क्षोभ तो हुआ और
इसे बनारस से प्रकाशित होने वाले दैनिक समाचार पत्र ने जनता की इस
असहाय स्थिति पर खेद भी प्रकट किया। इलाहाबाद से प्रकाशित पत्रिका
'चाँद' (नवम्बर 1928) अंक फाँसी विशेषांक के रूप में निकला।¹
अखिल भारतीय कांग्रेस ने अपने अधिवेशन में सरकार की तीव्र
आलोचना की कि उसने जनता की भावनाओं की उपेक्षा करके
क्रांतिकारियों को फाँसी की सजा दी। क्रांतिकारियों के परिवार के प्रति
कांग्रेस ने अपनी सहानुभूति प्रदान की।²
अशफाक उल्ला खाँ अपने खानदान पर लगे दाग धो देना चाहते
थे और उन्होंने अपने कृतित्व से यह दाग धो भी डाला। अशफाक का
प्रारम्भिक जीवन सिर्फ खेलकूद में ही नहीं वरन् देश की चिन्ता और आम
लोगों को शोषण से निजात दिलाने के वैचारिक मंथन में बीता। वे हमेशा
धीर-गम्भीर बने रहते और कभी अपनी सुन्दरता और देह बल का
अभिमान न करते।
1.स्वतंत्रता आन्दोलन में जनपद शाहजहाँपुर का योगदान-डॉ०एन.सी.मेहरोत्रा पृष्ठ144
2.दि हिस्ट्री ऑफ दि इंडियन नेशनल काँग्रेस, भाग-एक-पृष्ठ 540,पट्टाभि
सीतारमैया
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हाँ इतना अवश्य था कि उन्हें अपने बल पर विश्वास था। खुद के
विचारों में स्वस्थय मानसिकता बना लेना अशफ़ाक की खूबी थी। देश के
सशस्त्र क्रांति के प्रयास में अपने जीवन की आहुति देने वाले अशफ़ाक
उल्ला ख़ाँ ने जब क्रांतिकारी आन्दोलन में प्रवेश किया तो वे छात्र ही थे।
फाँसी के समय उनकी उम्र मात्र 27 वर्ष की थी। अशफ़ाक का क्रांतिकारी
जीवन लगभग सात वर्ष का रहा और इतने ही अल्पकाल में वे देश की
राजनीति और समाज की धड़कन से परिचित हो गये थे। अशफ़ाक उल्ला
ख़ाँ सिर्फ एक सिपाही ही नहीं थे कि लड़े और मृत्यु को प्राप्त हो गये।
वे हमारे समय के क्रांतिकारियों में प्रखर चिन्तक के रूप में भी हमारे बीच
उपस्थित होते हैं। उनकी कविताएँ एवं उनके वैचारिक लेख और राष्ट्र के
नाम संदेश तथा उनके द्वारा लिखे गये पत्रों से स्पष्ट हो जाता है कि वे
किस हद तक वैचारिक धरातल पर दृढ़ थे। यह स्पष्ट है कि क्रांतिकारी
गतिविधियों, फरारी जीवन, जेल की जिन्दगी में से ऐसा समय ही नहीं
मिला कि वे बाकायदा अपने विचार लिपिबद्ध कर पाते।
इन्ही में से समय निकाल कर जो उन्होंने लिखा है वह बहुत थोड़ा
है, जिसे पढ़कर लगता है कि वे चाहते हुए भी अपने सोचे हुए को कागज
पर उतार नहीं सके। वे बहुत कुछ लिखना चाहते थे, वे बच्चों के लिए
पुस्तकों की रचना करना चाहते थे, उन्हें भावी पीढ़ी की बहुत चिन्ता थी,
लेकिन उनकी इच्छा अधूरी रह गयी। उनके लिखे पत्रों, कविताओं और
डायरी में लिखे अंशों से हमें उनके जीवन के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी
मिलती हैं।
देश की स्वतंत्रता और हिन्दू मुस्लिम एकता के लिए शहीद होने वाले
अशफ़ाक ने फाँसी से पहले अपनी डायरी में हिन्दुस्तान का नक्शा भी
बनाया था और देखने से लगता है कि वे खूब रोये थे। सुनने-देखने में
यह भी आता है कि आँसुओं के निशान अभी तक ज्यों के त्यों हैं।
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आज भी देश के नाम उनका संदेश प्रासंगिक है। उनकी कविताएं
हमें एक सूत्र में बाँधती हैं।
न कोई इंगलिश, न कोई जर्मन,
न कोई रशियन, न कोई तुर्की।
मिटाने वाले है अपने हिंदी,
जो आज हमको मिटा रहे हैं।
यह कहना सर्वथा गलत है कि क्रांतिकारियों के पास कोई विचार
नहीं था। अपने संदेश में अशफाक ने स्पष्ट कहा है कि वे किस तरह की
आज़ादी चाहते हैं। अशफाक की कल्पना समाजवादी थी, जहाँ कोई ऊंच
है न नीच। अशफाक ने किसान, मजदूरों की तरक्की की बात भी कही।
वे कारखानों और गांवों में लोगों के बीच जमकर काम करने में विश्वास
रखते थे। अशफाक शोषण के कारणों की बात करते है और उसके
खिलाफ जंग लड़ने की बात करते हैं।
<u>देश वासियों के नाम भेजा गया संदेश</u>
‘‘बिरादराने वतन की खिदमत में उनके उस भाई का सलाम पहुँचे
जो उनकी इज्जत व नामू से वतन की खातिर फैजाबाद जेल में कुर्बान हो
गया। आज जबकि मैं यह पैगाम बिरादराने वतन को भेज रहा हूँ, इसके
बाद मुझको तीन दिन और चार रातें और गुजारनी हैं और फिर मैं हूँगा
और आगोशे मादी वतन होगा। हम लोगों पर जो जुर्म लगाये गये थे
वह इस सूरत में पब्लिक में लाए गये कि हमको बहुत से लोग
गेरेतालीमय़ाफ्ता या हुकूमत के दस्तरख्वान की पसेखुर्दा हड्डियाँ चचोड़ने
वाले थे, डाकू, खूनी, कातिल के लकब से पुकारा किए। मैं आज इस
फाँसी की कोठरी में बैठा हुआ भी खुश हूँ और अपने उन भाइयों का
शुक्रिया अदा करता हूँ। और कहूँगा -
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मर मिटा आप पै कौन! आपने यह भी सुना,
आपकी जान से दूर! आप से शिकवा है मुझे।
खैर यह तुम्हारा फैल है कि हमारी कुर्बानियों को कबूल न करो
और यह हमारा फर्ज है कि बार-बार ठुकराओ मगर हम तुम्हारा ही दम
भरे जायेंगे। बिरादराने वतन, मैं उसी पाक व मुकद्दस वतन ही की
कसम खाकर कहूँगा कि हम नंगे नामूसे वतन पर कुर्बान हो गए। क्या
यह शर्म की बात नहीं कि हम अपनी आँखों से देखते कि नित नए
मुज़ालिम हो रहे है और गरीब हिन्दुस्तानी हर हिस्साये मुल्क और
खित्तयेदुनिया में जलील और रुसवा हो रहे हैं और कहीं न ठिकाना है
न सहारा। किस्सा मुख्तसर ये कि हमारा वतन भी हमारा नहीं। हम पर
टैक्स की भरमार, हमारी माली हालत का रोज बरोज गिरते जाना, 33
करोड़ बहादुर हिन्दुस्तानी हिन्दू और मुसलमान भेड़-बकरियों की मानिंद
बनाए गए। हमारे गोरे आका हमें ठोकरे मार दें तो बाज-पुर्स न हो।
जनरल डायर जलियावाला बाग को नमूने हशर बना दे। हमारी माताओं
की बेइज्जती करें। हमारे बूढ़ों और बच्चों पर बम के गोले, गन-मशीनों
की गोलियाँ बरसाएं और हर नया दिन हमारे लिए नई मुसीबते लेकर
आए। फिर भी हम बादये गफलत रहें और ऐशो-इशरत में अय्यायें- जवानी
गुजार देते। यह ख्याल करके -
जनूने हुब्बे वतन का मजा/शबाब में हैं,
लहू में फिर यह रवानी रहे/रहे न रहे।
जो भी किया, भला किया, आज हम नाकाम रहे, डाकू हैं।
कामायाब होते मुहिब्बते वतन के पाक लकब से पुकारे जाते। और जो भी
आज हम पर झूठी गवाहियाँ दे गए, हमारे नाम के जयकारे लगाते -
बहे बहरे फना में जल्द/यारब लाश बिस्मिल की,
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कि भूखी मछलियाँ हैं/जौहरे शमशीरे कातिल की।
आह! क्या ऐसे दौर की जिन्दगी प्यारी ख्याल की जा सकती है।
जबकि हमारे ही गिरोह-सियासी में खलफिशार मचा है। कोई तबलीग का
दिलददा है, जो कोई शुद्धि पर मर मिटने को बाइसेनिजात समझ रहा है।
मुझे तो रह-रहकर इन दिमागों और अक्लों पर तरस आ रहा है जो कि
बेहतरीन दिमाग हैं और माहरीने सियासत हैं। काश कि वह अज़ादिए
मिस्र की जद्गदोजहद एहरारान मिस्र के कारनामें और बर्तानवी सियासी
चाले स्टडी कर लें और हमारे हिन्दुस्तान की मौजूदा हालत से मुकाबिला
व मवाज़ना करें, क्या ठीक वही हाल इस वक्त नहीं है। गवर्नमेंट के
खुफिया एजेन्ट प्रोपेगेंडा मजहबी बुनियाद पर फैला रहे हैं। इन लोगों का
मकसद मजहब की हिफाजत या तरक्की नहीं है बल्कि चलती गाड़ी में
रोड़ा अटकाना है। मेरे पास वक्त नहीं है न मौका है कि सब कच्चा
चिट्ठा खोलकर रख देता जो मुझे अय्यामे फरारी में और उसके बाद
मालूम हुआ है। यहाँ तक मुझे मालूम है कि मौलवी नियामतुल्ला
कादियानी कौन था कि काबुल में संगसार किया था। वह ब्रिटिश एजेन्ट
था। जिसके पास हमारे करमफरमा खान बहादुर, तसद्दुम हुसैन साहब
डिप्टी सुपरिटेंडेन्ट सी०आई०डी० गवर्नमेंट ऑफ इण्डिया पैगाम लेकर गए थे
मगर बेदारमगज हुकूमत काबुल ने इलाज जल्द कर दिया और मर्ज को
फैलने न दिया। मैं अपने हिन्दुओं और मुसलमान भाइयों को बता देना
चाहता हूँ कि सब ढ़ोंग हैं, जो सी०आई०डी० के खुफिया खजाने के रूपये
से रचा गया है। मैं मर रहा हूँ और वतन पर मर रहा हूँ। मेरा फर्ज है
कि हर नेको बद बात भाइयों तक पहुंचा दूँ। मानना न मानना उनका
काम है। मुल्क के बड़े-बड़े लोग इससे बचे हुए नहीं हैं। बस आवाम को
आँखे खोलकर इत्तबा करना चाहिए।
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भाइयों! तुम्हारी खानाजंगी तुम्हारी आपस में फूट, तुम दोनों में से
किसी के भी सूदमंद साबित न होगी। यह गैर मुमकिन है कि 7 करोड़
मुसलमान शुद्ध हो जाएँ और वैसे ही यह भी महमल-सी बात है कि 22
करोड़ हिन्दू मुसलमान बना लिए जाएं। मगर हाँ यह आसान है और
बिल्कुल आसान है कि यह सब मिलकर गुलामी का तौक गले में डाल
लें। ऐ वह कौम जिसका कोई कौमी झंडा नहीं-ऐ वह कि तेरा वतन मेरा
वतन नहीं-ऐ कि दूसरों की तरफ हाथ फैलाए हुए रहम की दरख्वास्त पर
नजर रखनेवाली बेकस कौम तेरी अपनी गलतियों का यही नतीजा है कि
आज तू गुलाम है और फिर वही गलतियाँ कर रही है कि आने वाली
नस्लों के लिए धब्बा गुलामी का छोड़ जाएगी कि जो भी सर जमीने हिन्द
पर कदम रखेगा, गुलामी में रखेगा और गुलाम बनाएगा। ऐ खुदावंदे
कुद्दूस क्या कोई ऐसा सबेरा नहीं आयेगा कि जिस सुबह को तेरा
आफताब आजाद हिन्दुस्तान पर चमके और फिजाए हिन्द आजादी के नारों
से गूँज उठे। कांग्रेस वाले हों कि सौराजिस्ट तलबीगवाले हो कि
शुद्धिवाले, कम्युनिस्ट हो कि रिवोल्यूशनरी, अकाली हो कि बंगाली, मेरा
पयाम हर फरजंदेवतन को पहुँचे। मैं हर शख्स को उसकी इज्जत व
मज़हब का वास्ता देता हूँ। अगर वह मजहब का कायल नहीं तो उसके
ज़मीर को और जिसको भी वह मानता हो, अपील करता हूँ कि हर
काकोरी केस के मर जाने वाले नौजवानों पर तरस खाओ। और फिर
हिन्दुस्तान को सन् 20 व 21 वाला हिन्दुस्तान बना दो। फिर अहमदाबाद
कांग्रेस जैसा इत्तिहाद इत्तिफाक का नजारा सामने हो। बल्कि उससे
बढ़कर हो और मुकम्मल आजादी का जल्द-से-जल्द ऐलान करके इन गोरे
आकाओं को हटा दो कि ये अब केंचुली उतार चुके हैं और अब वह किसी
मंत्र से बस में न होंगे-तबलीग व शुद्धी वालो खुदारा-आंखें खोलो, कहाँ
थे और कहाँ पहुँच गये, अपनी-अपनी शान खत्म करो, सोचो तो मजहब
में जबरदस्ती इखतिलाफे राय पर जंग, एक काम नामुकम्मल छोड़कर
दूसरी तरफ रुजू हो गये।
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आज कौन ऐसा हिन्दू या मुसलमान है जो मजहबी आजादी इतनी
रखता है कि जितना उसका हक है? क्या गुलाम कौम का कोई मजहब
नहीं होता? तुम अपने मजहब का सुधार क्या कर सकते हो? तुम खुदा
की इबादत पुरसुकून तरीके पर करो। तुम ईश्वर का ध्यान खामोशी से
करो और दोनों मिलकर इस सफेद भूत को मंत्र से जंत्र से उतार भगाओ।
इसी की यह सारी कार्यवाही है। जब यह भूत उतर जाएगा, हमारी आँखें
खुल जायेंगी। आओ हमारी भी सुनो, पहले हिन्दुस्तान को आजाद करो,
फिर कुछ और सोचना, खुदा ने जिसके लिए जो रास्ता मुंतखिब कर दिया
है, वह उसी पर रहेगा। तुम किसी को भी नही हटा सकते। <u>आपस में</u>
<u>मिल-जुलकर रहो और मुत्तहिन्द हो जाओ नहीं तो सारे हिन्दुस्तान की</u>
<u>बद बख्ती का वार तुम्हारी गर्दन पर है और गुलामी का बाइस तुम हो।</u>
कम्युनिस्ट ग्रुप के अशफाक की गुजारिश है कि तुम इस गैरमुल्की
की तसव्वुर करते हो, देसी चीजों से नफरत, विदेशी पोशाक और
तर्जेमआशरत के दिलदादा हो, इससे काम नहीं चलेगा। अपने असली रंग
में आ जाओ। देश के लिए जिओ, देश के लिए मरो। मैं तुमसे काफी तौर
पर मुत्तफिक हूँ और कहूँगा कि मेरा दिल गरीब किसानों के लिए और
दुखिया मजदूरों के लिए हमेशा दुखी रहा है। मैं अपने अय्यामे फरारी में
भी अक्सर इनकी हालत देखकर रोया किया हूँ क्योंकि मुझे इनके साथ
दिन गुजारने का मौका मिला है। मुझसे पूछो तो मैं कहूँगा कि मेरा बस
हो तो मैं दुनिया की हर मुमकिन चीज इनके लिए वक्फ कर दूँ। हमारे
शहरों की रौनक इनके दम से है। हमारे कारखाने उनकी वजह से आवाद
और काम कर रहे हैं। हमारे पंपों से इनके हाथ का पानी निकालते हैं,
गर्ज कि दुनिया का हर एक काम इनकी वजह से हुआ करता है। गरीब
किसान बरसात के मूसलाधार पानी और जेठ-बैसाख की तपती दोपहर में
भी खेतों पर जमा होते हैं और जंगल में मँडलाते हुए हमारी खुराक का
सामान पैदा करते हैं।
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यह बिल्कुल सच है कि वह जो पैदा करते है जो वह बनाते हैं उनमें
उनका हिस्सा नहीं होता, हमेशा दुखी और मफलूकुल हाल रहते हैं। मैं
इत्तिफाक करता हूँ कि इन तमाम बातों के जिम्मेदार हमारे गोरे आका
और उनके एजेन्ट हैं। मगर इनका इलाज क्या है कि उनको उस हालत
पर ले आएँ कि वह महसूस करने लगें कि वह क्या हैं। इसका वाहिद
जरिया यह है कि तुम उन जैसी वज़ा किरा इख्तियार करो और
जेंटलमैनी छोड़कर देहात का चक्कर लगाओ। कारखानों में डेरे डालो
और उसकी हालत स्टडी करो और उनमें एहसास पैदा करो। तुम कैथरीन
ग्रांड मदर ऑफ रशिया की सवानेह उमी पढ़ो और वहां के नौजवानों की
कुरबानियाँ देखो। तुम कालर टाई और उम्दा सूट पहनकर लीडर जरूर
बन सकते हो, मगर किसानों और मजदूरों के लिए फाइदेमन्द साबित नही
हो सकते। दीगर पॉलिटिकल जमाअतों से मुत्तहिद होकर काम करो और
अपनी माद्दापरस्ती से किनारा करो कि यह फिजूल है जो तुम्हे दूसरी
जमाअतों से अलग किये हुए हैं।
मेरे दिल में तुम्हारी इज्जत है और मैं मरते हुए भी तुम्हारे सयासी
मकसद से बिल्कुल मुत्तफिक हूँ। मैं हिन्दुस्तान की ऐसी आजादी का
ख्वाहिशमंद था जिसमें गरीब खुश और आराम से रहते। खुदा मेरे बाद
वह दिन जल्द आए जबकि छत्तरमंजिल लखनऊ में अब्दुल्ला मिस्त्री लोको
वर्कशाप और धनिया चमार, किसान भी मिस्टर खलीकउज्जमा और
जगत नारायण मुल्ला व राजा साहब महमूदाबाद के सामने कुर्सी पर बैठे
हुए नजर पड़े। मेरे कामरेडो मेरे रिवोल्यूशनरी भाइयों -तुमसे मैं क्या कहूँ
और तुमको क्या लिखूँ, बस अब तुम्हारे लिए क्या कुछ कम मुसर्रत की
बात होगी, जब सुनोगे कि तुम्हारा एक भाई हँसता हुआ फाँसी पर चला
गया और मरते-मरते खुश था। मैं खूब जानता हूँ कि जो स्प्रिट तुम्हारा
तबका रखता है - चूँकि मुझको भी फख्र है और अब बहुत ज्यादा फख्र है
कि एक सच्चा रिवोल्यूशनरी होकर मर रहा हूँ।
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मेरा पयाम तुमको पहुँचाना फर्ज था, मैं खुश हूँ-मसरूर हूँ, मैं उस
सिपाही की तरह हूँ जो फायरिंग लाइन पर हंसता चला जा रहा हो और
खंदको में बैठा हुआ गा रहा हो। तुम्हें दो शेर हसर मोहानी साहब का लिख
रहा हूँ -
जान को महवे गम बना दिल को वफा निहाद कर,
बंद ये इश्क है तो यू कता रहे मुराद की।
ऐ कि निजाते हिन्द की दिल से है तुझको आरजू,
हिम्मते सर बुलन्द से यास का इंसदाद कर।
हजार दुख क्यों न आएँ-बहरे जख्खार दरमियान में मौंजे
मारें-आतिशी पहाड़ क्यों न हायल हो जाएँ मगर ये आजादी के शेरों
अपने-अपने गरम खून को मातृभूमि पर छिड़कते हुए और जानों को
मातृवेदी पर कुर्बान करते हुए आगे बढ़े चले जाओ। क्या तुम खुश न
होगे जब तुमको मालूम होगा कि हम हँसते हुए मर गए। मेरा वजन
जरूर कम हो गया है और वह मेरे कम खाने की वजह से हो गया है।
किसी डर या दहशत की वजह से नहीं हुआ है-और मैं कन्हाई लाल दत्त
की तरह वजन न बढ़ा सका मगर खुश हूँ और बहुत खुश हूँ। क्या मेरे
लिए इससे बढ़कर कोई इज्जत हो सकती है कि सबसे पहला और अब्बल
मुसलमान हूँ जो आजादिए वतन की खातिर फाँसी पा रहा हूँ - <u>मेरे</u>
<u>भाइयो! मेरा सलाम लो और इस नामुकम्मल काम को, जो हम से रह</u>
<u>गया है तुम पूरा करना। तुम्हारे लिए यू०पी० में मैदाने-अमल तैयार कर</u>
दिया है, तुम्हारा काम जाने। इससे ज्यादा उम्दा मौका तुम्हारे हजार
प्रोपेगंडे से न होता। स्कूल और कालेजों के तुलवा हमारी तरफ दौड़ रहे
हैं, अब बहुत अर्से तक दिक्कत न होगी -
201
उठो-उठो सो रहे हो नाहक/पयामे बाँगे जरस तो सुन लो,
बढ़ो कि कोई बुला रहा है, निशाने मंजिल दिखा-दिखाकर।
ज्यादा क्या लिखूँ, सलाम लो-और कमर हिम्मत बाँध लो और
मैदाने-सियासी लीडरों मेरा सलाम कबूल करो और तुम हम लोगों को उस
नजर से न देखना जिस नजर से दुश्मनाने वतन और खाइनीने कौम
देखते थे। न हम डाकू थे न कातिल -
कहाँ गया कोहेनूर हीरा/किधर गई हाय मेरी दौलत,
वह सबका सब लूटकर कि उलटा/हमीं को डाकू बता रहे हैं।
हमीं को दिन-दहाड़े लूटा, फिर हमीं डाकू हैं। हमारे भाइयों और
बहनों और बच्चों को जलियानवाला बाग में भून डाला और अब हमीं को
कालस बलूट फैसले में लिखा जाता है। अगर हम ऐसे हैं तो वह कैसे हैं
और किस खिताब से पुकारे जाने के काबिल हैं, उन्होंने हिन्दुस्तान का
सुहाग लूट लिया, जिन्होंने लाखों बहादुरों को अपनी गरज के लिए
मेसोपोटामिया और रूस के मैदान में सुलवा दिया, खूँखार जानवर,
जालिम दरिंदे वह हैं कि हम? हम बेवश थे, कमजोर थे, सब कुछ सुन
लिया और ऐ वतनी भाइयों यह सब तुमने सुनवाया। आओ फिर मुत्तहिद
हो जाओ, फिर मैदाने अमल में कूद पड़ो और मुकम्मल आजादी का
ऐलान कर दो। अच्छा अब मैं रुखसत होता हूँ और हमेशा के लिए
खैरबाद कहता हूँ। खुदा तुम्हारे साथ हो और फिजाये हिंद पर आजादी
का झंडा जल्द लहराए। मेरे पास न वह ताकत है कि हिमालय की चोटी
पर पहुँचकर एक ऐसी आवाज निकालूँ जो हर शख्स को बेदार कर दे और
न वह असबाब है कि जिससे फिर तुम्हारे दिल मुश्ताइल कर दूँ कि तुम
उसी जोश से आगे बढ़कर खड़े हो जाओ जैसे सन् 20 या 21 में थे। मैं
चंद सुतूर के बाद रुख़सत होता हूँ : -
202
To every man upon this earth,
Death cometh soon or late,
But (then) how can a man die better,
Than facing fearful odds,
For the ashes of his fathers and,
Temples of his God.
बाद को मैं इन भाइयों से रुखसत शुक्रिया के साथ होता हूँ जिन्होंने
हमारी मदद जाहिर तौर पर की या पोशीदा और यकीन दिलाऊँगा कि
अशफाक आखिरी दम तक सच्चा रहा और खुशी-खुशी मर गया और
ख्यानते-वतनी का उस पर कोई नहीं लगाया जा सकता। वतनी भाइयों
से गुजारिश है कि मेरे बाद मेरे भाइयों को वक्त जरूरत न भूलें और
उनकी मदद करें और उनका ख्याल करें।
वतन पर मर मिटने वाला
अशफाक वारसी 'हसरत'
अज, फैजाबाद जेल
मेरी तहरीर मेरे वतनी भाइयों तक पहुँच जाए। ख्वाह विद्यार्थी जी
अखबार के जरिए से या अग्रेजी, हिन्दी, उर्दू में छापकर कांग्रेस के अय्याम
में तकसीम करा दें, मशकूर हूँगा। मेरा सलाम कबूल करें और मेरे भाइयों
को न वह कभी भूलें और न मेरे वतनी भाई फरामोश करें। अलविदा !
अशफाक उल्ला वारसी 'हसरत'
फैजाबाद
जेल
19 दिसम्बर
1927¹
- अशफाक उल्ला और उनका युग, सुधीर विद्यार्थी पृष्ठ 148-156
203
अशफाक चले गये और अलविदा से पहले देश के नाम अपना
संदेश छोड़ गये। संदेश के माध्यम से हम उनके वैचारिक धरातल को
ठीक से समझ सकते हैं, उनके कृतित्व व्यक्तित्व के विषय में तमाम
सच्चाइयों का पता भी चलता है।
फाँसी पर जाने के पूर्व अशफाक ने कहा भी था - "भारत माता के
रंगमंच पर अपना पार्ट अब हम अदा कर चुके। हमने गलत-सही जो कुछ
किया वह स्वतंत्रता प्राप्ति की भावना से किया। हमारे इस काम की कोई
प्रशंसा करेगा तो कोई निंदा। किन्तु हमारे साहस और वीरता की प्रशंसा
हमारे दुश्मनों तक को करनी पड़ी है। क्रांतिकारी बड़े वीर योद्धा और बड़े
अच्छे वेदान्ती होते हैं। वे सदैव अपने देश की भलाई सोचा करते हैं। वे
कहते है कि हम देश को भयग्रस्त करते हैं, किन्तु बात ऐसी नहीं हैं।
इतनी लम्बी मियाद तक हमारा मुकदमा चला, मगर हमने किसी एक
गवाह तक को भयग्रस्त करने की चेष्टा नहीं की, न किसी मुखबिर को
गोली मारी। हम चाहते तो किसी गवाह, किसी खुफिया पुलिस के
अधिकारी या किसी अन्य ऐसे आदमी को मार सकते थे, किन्तु यह
हमारा उद्देश्य नहीं था। हम तो कन्हाईलाल दत्त, खुदी राम बोस, गोपी
मोहन साहा आदि की स्मृति में फाँसी पर चढ़ जाना चाहते थे।
जजों ने हमें निर्दय, बर्बर, मानव कलंक आदि विशेषणों से याद
किया है। किन्तु हम पूछते हैं कि क्या इन जजों ने जलियावाला बाग में
गोली चलाते देखा या सुना, क्या उसने निरस्त्र भारतीयों-स्त्री पुरुष, बाल
वृद्ध सब पर गोलियाँ नहीं चलायी थी। कितने जजों ने उसे इन विशेषणों
से विभूषित किया। फिर क्या यह मजाक हमारे ही साथ उड़ाने को है।
भारतीय भाइयों, आप कोई हों, चाहे जिस धर्म या सम्प्रदाय के अनुयायी
हों, परन्तु आप देशहित में एक जुट होकर योग दीजिए। आप लोग व्यर्थ
में लड़-झगड़ रहे हैं। सब धर्म एक है, रास्ते चाहे भिन्न-भिन्न हो परन्तु
लक्ष्य सबका एक ही है।
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फिर यह झगड़ा बखेड़ा क्यों? हम मरने वाले काकोरी के अभियुक्तों
के लिए आप लोग एक हो जाइए और सब मिलकर नौकर शाही का
मुकाबला कीजिए। यह सोचकर कि 7 करोड़ मुसलमान भारतवासियों में मैं
सबसे पहला मुसलमान हूँ जो भारत माता की स्वतंत्रता के लिए फाँसी पर
चढ़ रहा हूँ, मैं मन ही मन अभिमान का अनुभव कर रहा हूँ किन्तु मैं
यह विश्वास दिलाना चाहता हूँ किं मैं हत्यारा नहीं था, जैसा कि मुझे
साबित किया गया है।
अब मैं विदा होता हूँ। ईश्वर आप सबका भला करे। इस अवसर
पर एनुद्दीन, मजिस्ट्रेट श्रीखैरात अली, पब्लिक प्रोसीक्यूटर, सी०आई०डी०
के अधिकारी खासकर खान बहादुर तसद्दुक हुसैन साहब तथा अन्य
गवाहों को धन्यवाद देना अनुचित न होगा। क्योंकि इन्ही की कृपा से
यह मान मर्यादा प्राप्त हुई। मेरे परिवार में आज तक देश सेवा के लिए
कोई त्याग न हुआ था, अब यह कलंक छूट जायेगा। अन्त में अपने
साथी अभियुक्तों तथा मुखबिरों और इकबाली मुलजिमों से भी वन्दे करता
हूँ। सबको आखिरी सलाम। भारतवर्ष सुखी हो मेरे भाई आनंद लाभ करें।’’¹
निश्चित ही अशफाक को समझना अपने देश की संस्कृति की झलक
पाना है। अशफाक उल्ला खाँ ने स्वतंत्रता को मेहनतकश जनता के
जीवन की स्वतंत्रता से जोड़ा था। क्योंकि उनके लिए देश केवल धरती,
जंगल पहाड़, नदी नाले से नहीं है। जनता के बिना देश या राष्ट्र का
कोई मतलब नहीं होता। उन्हें पता था देश की बहुसंख्यक जनता गाँव में
रहती है। अधिकतर लोग गरीबी की चक्की में पिस रहे हैं, कम दिहाड़ी
पर कारखानों में काम कर रहे हैं, लाखों सड़क पर हैं। इसलिए देश को
आजाद करना है तो इन्हें आगे लाना होगा। किसानों, मजदूरों को
संगठित करना होगा।
- अशफाक उल्ला और उनका युग, सुधीर विद्यार्थी, पृष्ठ -156-157
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अशफाक ने कहा है कि -'मेरा दिल गरीब किसानों और दुखियों
मजदूरों के लिए हमेशा दुखी रहा है। मैं तो अपने अय्यामें फरारी में भी
अक्सर इनकी हालत देखकर रोया किया हूँ क्योंकि मुझे इनके साथ दिन
गुजारने का मौका मिला है। निश्चित ही अशफाक उल्ला खाँ उस दौर के
क्रांतिकारियों में एक मजबूत चरित्र के रूप में नजर आते हैं। जहाँ एक
तरफ संवेदनशील और प्रगतिशील कवि, शायर के रूप में हमे नजर आते
है वही वे एक कुशल पार्टी के कार्यकर्ता के रूप में दृढ़ता से खड़े दिखते
हैं और अन्त तक उनके विचारों में कोई परिवर्तन नहीं आया। प्रमुख
क्रांतिकारी नेता अमर शहीद सरदार भगत सिंह ने लिखा है कि -‘‘आप
(अशफाक) श्री राम प्रसाद के दायें हाथ थे, मुसलमान होने के बावजूद
आपको कट्टर आर्य समाजी धर्म से हर दर्जे तक का प्रेम था। दोनों प्रेमी
एक बड़े काम के लिए अपने प्राण उत्सर्ग कर अमर हो गये।’’
शहीदे आज़म अशफाक उल्ला खाँ ने देश की आजादी के लिए
अपने प्राणों की आहुति दी। उनका यह उत्सर्ग आने वाली पीढ़ियाँ सदैव
स्मरण करेंगी तथा उनके कृतित्व एवं व्यक्तित्व से हमेशा प्रेरणा पाती
रहेंगी।
अशफाक के शब्द आज भी स्मृति में है और गूँजते हैं -
‘‘कुछ आरजू नहीं है, है आरजू तो यह है,
रख दे कोई जरा - सी खाके वतन कफन में।’’
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सन्दर्भ ग्रन्थ सूची
-: संदर्भ ग्रन्थ सूची :-
प्रस्तुत शोधग्रन्थ की सर्जना हेतु मुझे अपने शोध सलाहकार श्रद्धेय प्रोफेसर श्री
अनिल कुमार मिश्र एवं निम्न ग्रन्थों से अपार सहयोग प्राप्त हुआ -
1 :- Cambridge history of india vol VI :- God well H.H
2 :- भारत में क्रान्तिकारी आंदोलन का इतिहास। :- मनमथ नाथ गुप्त
3 :- History of the Congress Part I :- पट्टाभिसिता रमैया
4 :- History of freedom movement of India, Vol II :- R.C Majumdar
5 :- A Century History of Indian national :- B.N. Pandey
Congress Vol II
6 :- भारत के अमर क्रान्तिकारी अशफाक उल्ला खाँ :- डा० भवानी सिंह
7 :- अशफाक उल्ला खाँ और उनका युग :- सुधीर विद्यार्थी
8 :- जांबाज पत्रिका :- शहीद ए वतन अशफाक उल्ला खाँ
जन्म शताब्दी समारोह समिति।
9 :- भारतीय स्वतंत्रता का इतिहास :- विपिन चन्द्रा।
10 :- स्वतंत्रता संघर्ष :- डा० तारा चन्द।
11 :- आधुनिक भारत :- डा० सुमित सरकार ।
12 :- आधुनिक भारत का इतिहास :- वी० एल० ग्रोवर।
13 :- प्राचीन विश्व इतिहास का परिचय :- प्रगति प्रकाशन
14 :- काकोरी शहीद स्मृति :- डा० भगवानदास माहौर
15 :- भारत का स्वतन्त्रता संघर्ष :- विपिन चन्द्र
16 :- द इंडियन पालिटिकल सिस्टम :- नार्मन डी. यामर
17 :- आजादी के दस्तावेज :- ख्वाजा हसन नियाजी
18 :- भारत में राष्ट्रीयता का विकास :- डा. एस. एल. नागोरी
19 :- हाऊ इण्डिया राट फार फ्रीडम :- एनीबेसेन्ट
207
20 :- भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम का इतिहास - राम गोपाल
21 :- भारत वर्तमान और भावी - रजनीपाल दत्त
22 :- वाजिद अलीशाह और अवध राज्य का पतन - परिपूर्णानंद वर्मा
23 :- हिस्ट्री आफ दी इंडियन म्यूटिनी - सर जान विलियम्स
24 :- स्वतंत्रता आन्दोलन में शाहजहांपुर का योगदान - डा. एन. सी. मेहरोत्रा
25 :- द इंडियन रिवेलियन - डा. ए. डफ
26 :- पूर्वा - जगदीश चन्द्र दीक्षित
27 :- अशफाक उल्ला खां - भगत सिंह राणा
28 :- मैनपुरी जनपद का राजनैतिक इतिहास - चिन्तामणि शुक्ल
29 :- रामप्रसाद 'बिस्मिल' रचनावली - दिनेश शर्मा
30 :- मैनपुरी षड्यंत्र केस - पत्रांक 11/919 - राज्य अभिलेखागार लखनऊ
31 :- टेरारिज्म इन इंडिया 1917-36, गृह विभाग, भारत सरकार क्रम सं. 38/3
32 :- दे लिव्ड डैन्जरसली - मन्मथनाथ गुप्त
33 :- शहीद रोशन सिंह - सुधीर विद्यार्थी
34 :- अमर शहीद अशफाक उल्ला खाँ - बनारसी दास चतुर्वेदी
35 :- पूर्वा - योगेश चन्द्र चटर्जी
36 :- कार्यवाही काकोरी षड्यंत्र केस - अपील
37 :- सी.आई.डी. वाल्यूम-2, काकोरी षड्यंत्र केस - उ. प्र. राजकीय अभिलेखागार
38 :- अमर शहीद चन्द्रशेखर आजाद - वैशम्पायन
39 :- मेमायर्स - शिव वर्मा
40 :- शब्द - गोबिन्द बल्लभपन्त के भाषणों का
संकलन
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