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अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj

गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

[ ३ ]
गोरक्षनाथ - (वर्णरत्नाकर) ।
गोरक्षपा - (सस्क्य विहार की सूची) ।
नामों के ये रूपान्तर देने के दो प्रयोजन हैं। पहला तो यह कि
प्राचीन साधनात्मक और दार्शनिक ग्रन्थों में इन दोनों महासिद्धों
का स्मरण यह बतलाता है कि ये दोनों ही अपने समय के बहुत
प्रसिद्ध और अतिमान्य महासिद्ध थे और विभिन्न साधन संप्रदायों
के ग्रंथ इन्हें आदर के साथ स्मरण करते थे। दूसरी बात यह है कि
तन्त्र प्रभावापन्न सभी साधनसंप्रदायों ने इनका नाम अपनी सूची
में सम्मिलित कर लिया है, जैसे ये उन्हीं के संप्रदाय के हों। इसी-
लिए इनके नामों के इतने रूप मिलते हैं। इनकी प्रसिद्धि काल और
देश दोनों ही दृष्टियों से बहुत व्यापक थी। ऊपर के ग्रन्थों में योग,
तन्त्र और शैव ग्रन्थ अधिक हैं। इनमें से अधिकांश (जैसे हठ-
योगप्रदीपिका १४ वीं शताब्दी के पूर्व, वर्णरत्नाकर १३ वीं-१४ वीं
शताब्दी, कौलज्ञाननिर्णय के ग्रन्थ ११ वीं शताब्दी) १४ वीं शताब्दी
के पूर्व के हैं। तन्त्रालोक का समय ११ वीं शताब्दी का पूर्व भाग
है। अभिनवगुप्त के उल्लेख से इतना पूरी तरह से स्पष्ट हो जाता
है कि मत्स्येन्द्रनाथ १० वीं शताब्दी के अन्तिम दशक (९९१ ई०)
के पूर्व तक पर्याप्त प्रसिद्ध और पूजित हो चुके थे। जालंधरनाथ
राजा देवपाल (८०६-८४६ ई०) के समकालीन थे। इस प्रकार ये
तीनों महासिद्ध ९ वीं-१० वीं शताब्दी के पूर्व प्रसिद्ध हो चुके थे।
वैसे सिद्धकायावाले महासिद्धों का कालनिर्णय करना सांप्रदायिकों
की दृष्टि में उपहासास्पद है। बहुत से आधुनिक दृष्टिवाले नाथ-
पंथी गोरक्ष को वाक्यपदीयकार भर्तृहरि का समकालीन मानते हैं।
कुछ पौराणिक नाथपंथी गोरक्ष को यदुवंशी श्रीकृष्ण के एक विवाह
का साक्षी मानते हैं और कुछ लोगों का विश्वास है कि उन्होंने
चारो युगों में अलग-अलग स्थानों में अवतार भी लिये थे।
इतना विस्तृत उल्लेख मिलने पर भी गोरक्षनाथ का प्रामाणिक
जीवनवृत्त आज भी उपलब्ध नहीं है। उनके जन्मादि के सम्बन्ध
में नेपाल में प्रचलित एक कथा के अनुसार महादेव ने एक पुत्र-
कांक्षिणी नारी को विभूति दी। नारी ने अविश्वास कर उसे गोबर
के ढेर में फेंक दिया। बारह वर्ष बाद महादेव के पुनः अनुसंधान के

[ ४ ]
फलस्वरूप उस स्थान से गोरक्ष का आविष्कार हुआ। इन्हीं गोरक्ष-
नाथ ने मत्स्येन्द्रनाथ का शिष्यत्व ग्रहण किया। बाद में गोरक्ष अपने
गुरु के साथ नेपाल गये। वहां अनाहूत होने पर उन्होंने मेघसमूहों
को आबद्ध कर अनावृष्टि कर दी। अचानक उस मार्ग पर मत्स्येन्द्र
के आने पर गोरक्षनाथ साष्टांग दण्डवत् करने के लिए उठे। मेघ
मुक्त हो गये और वहाँ वृष्टि हुई।⁸ उपर्युक्त जन्म सम्बन्धी कथांश
में कहीं कहीं महादेव के स्थान पर मत्स्येन्द्रनाथ का नाम मिलता है
और पुत्रकांक्षिणी नारी के ब्राह्मणी होने का भी कहीं कहीं उल्लेख
मिलता है।
उपर्युक्त कथा से दो बातें स्पष्ट होती हैं। पहली तो यह कि
गोरक्ष का जन्मवृत्तांत रहस्यमय है। दूसरी यह कि नेपाली परंपरा
के अनुसार मत्स्येन्द्र गोरक्ष के गुरु थे। गोरक्षसिद्धान्तसंग्रह के अनु-
सार गोरक्ष ईश्वरसन्तान थे। उनका चरित्र अत्यन्त शुद्ध और
निर्मल था। स्वयं देवी भगवती उनके चरित्र की परीक्षा लेने में परा-
जित हुई थीं।⁹ उनके जन्मस्थान और जीवनवृत्त के विषय में
विविध मत प्रचलित हैं। इनका संक्षेप इस प्रकार है।
१—नेपाल, पंजाब, गोरखपुर आदि को उनका जन्मस्थान माना
जाता है।
२—निराकार निरंजन के घर्म से गोरक्ष की उत्पत्ति हुई। ये मत्स्य-
जात मत्स्येन्द्र के पिता थे। इन्होंने अपने पाप का प्रक्षालन करने
के लिए गुरु का अन्वेषण किया और अन्त में अपने पुत्र का ही
गुरु रूप में वरण किया।
३—गोदावरी के तट पर एक ब्राह्मणी के गर्भ से गोरक्ष का जन्म
हुआ और बारहवें वर्ष के अन्त में मत्स्येन्द्र द्वारा आंतर्धानिक
रीति से संप्रदान हुआ। गोरक्ष ने गोसेवा की और योगशक्ति
प्राप्त की।
८. नाथ संप्रदायेर इतिहास दर्शन ओ साधनाप्रणाली—डा० कल्याणी
मल्लिक, पृ० २८०; कौलज्ञाननिर्णय—डा० प्रबोधचन्द्र बागची, भूमिका
पृ० १२।
६. नाथ संप्रदायेर इतिहास दर्शन ओ साधना प्रणाली—पृ० २६।

[ ५ ]
४—स्कंदपुराण में गोरक्षावतार की कथा मिलती है ।
५—गोरक्षनाथ गोपीचन्द्र की माता (मयनामती) के गुरु रूप में
स्वीकृत हैं ।१०
६—योगिसंप्रदायाविष्कृति में उन्हें गोदावरी तीर के किसी चन्द्र-
गिरि में उत्पन्न बताया गया है ।
७ दरबार लाइब्रेरी, नेपाल के गोरक्षसहस्रनाम नामक एक लघु-
काय हस्तलेख के एक श्लोक के अनुसार दक्षिण दिशा में स्थित
किसी बड़व नामक देश में महामन्त्र के प्रसाद से महाबुद्धिशाली
गोरक्षनाथ का अभ्युदय हुआ था ।
८—क्रुक्स और ग्रियर्सन द्वारा उद्धृत एक परंपरा के अनुसार गोरक्ष-
नाथ सत्ययुग में पंजाब के पेशावर में, त्रेता में गोरक्षपुर में,
द्वापर में द्वारिका के भी आगे हुरमुज में और कलिकाल में
काठियावाड़ की गोरखमढ़ी में प्रादुर्भूत हुए थे ।
९—बंगाल में प्रचलित एक विश्वास के अनुसार गोरक्षनाथ उसी
प्रदेश में उत्पन्न हुए थे ।
१०—नेपाली परम्पराओं के अनुसार गोरक्षनाथ पंजाब से नेपाल
गये थे ।
११—गोरखपुर के महन्त के अनुसार गुरु गोरखनाथ टिला (झेलम,
पंजाब) से गोरखपुर आये थे ।
१२—नासिक के योगियों का विश्वास है कि वे पहले नेपाल से पंजाब
आये और बाद में नासिक की ओर गये थे ।११
१३—सम्प्रदाय में टिला के प्राधान्य को देखकर ग्रिग्स ने अनुमान
किया है कि गोरक्षनाथ सम्भवतः पंजाब के निवासी रहे होंगे ।
१४—कच्छ में प्रसिद्ध है कि गोरक्षनाथ के शिष्य धर्मनाथ पेशावर
से कच्छ आये । ग्रियर्सन के अनुसार धर्मनाथ गोरक्षनाथ के
सतीर्थ थे ।
१०. वही, पृ० २६-३० ।
११. नाथ सम्प्रदाय—डा० हजारीप्रसाद द्विवेदी, पृ० ६६-६७ ।

[ ६ ]
१५-ग्रियर्सन का अनुमान है कि गोरखनाथ सम्भवतः पश्चिमी
हिमालय के रहने वाले थे।
१६-गोरक्षनाथ ने उड़ीसा की भी यात्रा की थी और मल्लिकानाथ
को शिष्य बनाया था।१२
उपर्युक्त विभिन्न मतों की परीक्षा कर गोरखनाथ के जीवनवृत्त
के सम्बन्ध में निम्नलिखित निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं—
१—गोरक्षनाथ के जन्मस्थान के सम्बन्ध में अधिकांश मत और
कथाएँ भारत के पश्चिमोत्तर भाग की ओर संकेत करती हैं।
२—उन्होंने अपने जीवन-काल में नेपाल, बंगाल, कच्छ, काठिया-
वाड़, नासिक, उड़ीसा आदि की यात्राएं की थीं।
३—यात्राओं के सम्बन्ध में प्रचलित विश्वासों और कथाओं से ऐसा
अनुमान होता है कि गोरखनाथ पंजाब से गोरखपुर गये। वहाँ
से वे नेपाल गये। नेपाल से वे पुनः पंजाब लौटे और फिर
नासिक के लिए प्रस्थान किया।
४--बंगाल की अपेक्षा पंजाब या भारत के पश्चिमोत्तर भाग से
उनका अधिक संबन्ध रहा।
५—उनके गुरु मत्स्येन्द्रनाथ थे।
६—जन्म किस वंश में हुआ, यह विवादास्पद है, तथापि प्रवाद
उनके ब्राह्मण होने की ओर संकेत करते हैं।
७--माता-पिता के संबन्ध में कोई विवरण उपलब्ध नहीं।
केवल प्रवादों, किंवदन्तियों और विश्वासों के आधार पर
निष्कर्ष निकालने के कई कारण हैं। उपर्युक्त विवरणों से यह प्रकट
है कि गोरक्षनाथ ने अकालसंन्यास लिया था अथवा वे बहुत बाल्या-
वस्था में ही संन्यस्त हो गये थे। अकालसंन्यास लेनेवाले बहुत से
आचार्यों, संन्यासियों की चर्चा बहुत पुरानी हो चुकी है। दूसरी
बात यह है कि संन्यासी होना वस्तुतः जन्मान्तर माना जाता है।
प्रायः संन्यासी होने के बाद नामादि का भी परिवर्तन होता है।
दीक्षाओं के अनुसार भी नामों में परिवर्तन होते हैं और फिर नाथ-
१२. नाथ और संत साहित्य—डा० नागेन्द्रनाथ उपाध्याय, परिशिष्ट २।

[ ७ ]
संप्रदाय में तो नादपरंपरा ही स्वीकार की जाती है, बिंदुपरंपरा
का यहाँ कोई महत्व नहीं। ऐसी स्थिति में यदि गोरक्षनाथ का
जीवनवृत्त उपलब्ध नहीं तो आश्चर्य नहीं करना चाहिए। संन्यासी
होने के बाद लोग अपने पूर्ववृत्त, जन्मस्थान, वंश, कुल, माता-पिता
आदि की चर्चा नहीं करते। अतः ऐसी स्थिति में केवल विश्वास,
किंवदन्तियाँ, प्रवाद आदि ही आधार रह जाते हैं।
सांप्रदायिकों द्वारा गोरक्ष नाम की विभिन्न प्रकार की व्याख्याएँ
प्रस्तुत की जाती हैं। इन व्याख्याओं का कई दृष्टियों से विचार
किया जा सकता है। इन व्याख्याओं का कुछ कथाओं से भी संबन्ध
स्थापित किया जा सकता है। ये साधनापद्धति और दर्शन से भी
संबन्ध रखती हैं और किसी क्रिया अथवा पक्ष की ओर संकेत करती
हैं। उदाहरण के लिए गोरक्षनाथस्तोत्र में कहा गया है—“ ‘ग’-कार
गुणसंयुक्त, ‘र’-कार रूपलक्षण, ‘क्ष’-कारेण अक्षय ब्रह्म श्री गोरक्ष
नमोऽस्तु ते।” इसके द्वारा गोरक्षशब्द का माहात्म्यवर्णन किया
गया है।१३ गोरख उपनिषद् में दो स्थलों पर दो भिन्न-भिन्न
व्याख्याएँ मिलती हैं। प्रथम के अनुसार गोरक्षनाथ अन्तर्यामी
होकर संसार के जीवों की इन्द्रियों (गो) की रक्षा करते हैं। दूसरे
स्थल के अनुसार गो शब्द का अर्थ वाक् ब्रह्म है। ‘र’ का अर्थ है
रक्षा करते हैं। ‘क्ष’ का अर्थ क्षयरहित अर्थात् अक्षय वाक् ब्रह्म की
रक्षा करनेवाले हैं श्री गोरक्षनाथ।१४ गोरक्षउपनिषद् की यह दूसरी
व्याख्या गोरक्षस्तोत्र से मिलती-जुलती है। एक आधुनिक सांप्र-
दायिक रचना ‘गोरक्षशब्द निरुक्ति:’ में कहा गया है—‘गां रक्षतीति
गोरक्षः, रक्षतीति रक्षः, गवां रक्षः गोरक्ष—यावद्गोपदवाच्य की जो
रक्षा करता हो, उसे गोरक्ष कहते हैं अर्थात् जितने भी गो शब्द के
अर्थ हैं उन अर्थों की रक्षा करने वाले का नाम गोरक्ष है।१५
१३. नाथ संप्रदायेर इतिहास, दर्शन ओ साधना प्रणाली–पृ० २६; गोरक्ष-
सिद्धांत-संग्रह–पृ० ४२।
१४. सिद्धसिद्धांतपद्धति ऐंड अदर वर्क्स आव नाथयोगीज–डा० कल्याणी
मल्लिक पृ० ७२-७३।
१५. गोरक्ष ग्रंथमाला का ८२ वां पुष्प, पृ० ६, पांच पुस्तिकाओं का संग्रह,
प्रकाशक—योगप्रचारिणी महासभा, गोरक्षटीला, काशी।

इस अन्तिम रचना 'गोरक्षशब्दनिरुक्तिः' में ऐसा दिखाया गया
है कि गोरक्ष शब्द बहुत प्राचीन साहित्य में मिलता है और उद्धरण-
कर्त्ता का अभिप्राय यह मालूम पड़ता है कि वह इस प्रयत्न से गोरक्ष
की प्राचीनता सिद्ध करना चाहता है। प्रमाण के लिए अथर्ववेद,
ब्रह्माण्डपुराण, स्कन्दपुराणान्तर्गत केदारखण्ड (अध्याय ४२, ४५,
४६, ७४), शिवपुराण, महाकाल योगशास्त्र कल्पद्रुम, गोरक्षगीता,
मार्कण्डेयपुराण, शाक्तप्रमोद आदि के विभिन्न उद्धरणों को प्रस्तुत
कर यह कहा गया है कि गोरक्षनाथ का निवासस्थान केदारखण्ड
के दक्षिण भाग में है, जहाँ सर्वदा अत्यन्त उष्ण जल विद्यमान रहता
है। अनुमानतः यह स्थान कांगड़ा अथवा हिंगलाज हो सकता है।
शिवपुराण के अनुसार गोरक्षनाथ शिवावतार थे। गोरक्षगीता में
बताया गया है कि इन्द्राणी के पातिव्रत की रक्षा में गोरक्षनाथ ने
सुराचार्य बृहस्पति की सहायता की थी। मार्कण्डेयपुराण में मार्कण्डेय
और मत्स्येन्द्रादि के द्विविध हठयोगी मतों की ओर संकेत है।
स्कंदपुराण के केदारखण्ड में नवनाथों में गोरक्ष की भी गणना की
गयी है। प्राणतोषिणी में नवनाथ वर्णनप्रसंग में विमलानन्दनाथ
नाम से श्रीनाथ (गोरक्षनाथ) का ही स्मरण किया गया है। इसी
प्रकार शाक्तप्रमोद में भी श्रीनाथ का वर्णन है। स्कंदपुराण के हिम-
वत्खण्ड में, विरूपाक्षतीर्थयात्रा के प्रकरण में भी गोरक्ष की सिद्धि-
प्रदायकता का वर्णन है।$^{१६}$ गोरक्ष शब्द की जो व्याख्याएं दी गयी
हैं और विभिन्न ग्रंथों में जिन-जिन प्रसंगों में उनके उल्लेख मिलते
हैं, उनसे श्रीगोरक्षनाथ की साधनात्मक असाधारणता, चारित्रिक
उच्चता, हठयोगाचार्य्यता की ओर संकेत होता है।
गोरक्षनाथ के जीवनवृत्त पर प्रामाणिक सामग्री के अभाव में
उनके चरित्र और व्यक्तित्व पर भी प्रामाणिक रूप में कुछ कहना
कठिन है। उनके नाम से प्राप्त रचनाओं, किंवदन्तियों, विश्वासों,
कथाओं के आधार पर कुछ अनुमान अवश्य किया जा सकता है।
कोई प्रामाणिक सामग्री न होने के कारण ही विद्वान् लोग गोरक्ष-
नाथ के चरित और व्यक्तित्व पर अभी तक कुछ न लिख सके थे।
लेकिन पूर्ण अभाव की स्थिति में यदि कुछ अनुमान के आधार पर


१६ वही, पृ० ८-१२ ।

[ ६ ]
ही कह लेने का अवसर मिल जाय तो उसे पूर्ण लाभ समझा जाय,
इसलिए कुछ विद्वानों ने प्रयास किया। डा० हजारीप्रसाद द्विवेदी
ने गोरखनाथ को शंकराचार्य के बाद दूसरा महिमाशाली व्यक्तित्व-
वाला महापुरुष घोषित किया। बाद में विद्वानों ने तत्कालीन परि-
स्थितियों का मूल्यांकन किया और यह स्थिर किया कि जिस समय
भारतवर्षीय धर्मसम्प्रदायों में वामाचार, पंचमकार के परम परि-
शुद्ध और साधनोन्नतिकारी रूप का दुरुपयोग और कुरूपोपस्थापन
होने लगा था और उसे मनुष्य की विगर्हित वासनाओं की पूर्ति
का साधन समझा जाने लगा था, उस समय साधना की पवित्रता,
चरित्र की परमोच्चता, संयमपूर्ण जीवन की शक्तिमत्ता और आडं-
बररहित जीवन की महिमा का उद्घोष गोरखनाथ ने ही किया।
वस्तुतः प्राचीन तांत्रिक साधना-परम्परा और उसके अवस्थागत
क्रमिक विकास के महत्व को गोरक्षनाथ अच्छी तरह जानते थे। इस-
लिए उन्होंने तांत्रिक साधना-गत मूल सिद्धान्तों, जैसे गुरु शिष्यवाद,
दीक्षा, परीक्षा, अधिकारभेदवाद की शैव संप्रदायों में पुनः पूर्ण
प्रतिष्ठा की क्योंकि उस समय अशैव बौद्धादि सम्प्रदायों में इन
नियमों और सिद्धान्तों के उल्लंघन से तांत्रिक साधना का विगर्हित
रूप प्रकट हो रहा था। गोरखनाथ की संस्कृत और हिन्दी दोनों
प्रकार की रचनाओं से उपर्युक्त नियमों के प्रमाण पुष्कल परिमाण
में प्राप्त हो सकते हैं। गोरक्षनाथ ने दूसरा महत्वपूर्ण कार्य शैव
सम्प्रदायों का संगठन करके सम्पन्न किया। बौद्धों की दार्शनिक क्षेत्र
में पराजय तो कुमारिल और शंकराचार्य प्रमाणित कर चुके थे,
लेकिन सांप्रदायिक और सामाजिक क्षेत्र में बौद्धों का अब भी बड़ा
प्रभाव था। बौद्ध संन्यासियों का प्रभाव हर्षवर्धन के समय तक
कितना था, यह इतिहास स्पष्ट बतलाता है। संन्यासियों में उनकी
संख्या सबसे ज्यादा थी। लेकिन शंकराचार्य के बाद भी शैव संन्या-
सियों का संगठन न हो पाया था और कालामुख, कापालिक, पाशु-
पत, लिंगायत आदि अनेक सम्प्रदाय तत्कालीन बौद्धों की तरह
जन-समाज में भय, शंका, घृणा आदि की दृष्टियों से देखे जाते
थे। समाज की साधनागत और धर्मगत समस्याओं का समाधान
प्रस्तुत करने की शक्ति इनमें समाप्त हो चली थी। यों कहा जा
सकता है कि इनकी सामाजिक उपयोगिता समाप्त हो गयी थी।

[ १० ]

अतः ये भी शक्तिहीन होते जा रहे थे। उसी समय काश्मीर शैव
दर्शन और साधना का विकास हो रहा था। उसमें कई आचार्यों
का अभ्युदय हो चुका था। इन सारी आवश्यकताओं और
परिस्थितियों को भली भाँति परख कर गोरक्षनाथ ने सदाचारपरा-
यण, संयमपूर्ण परम्परागत शैव दर्शन और साधना पर आधारित
और जीर्णप्राय शैव सम्प्रदायों से संगठित सिद्धमत अथवा नाथ-
योगी सम्प्रदाय का समारंभ किया। बहुत पहले से ही लकुलीश,
पाशुपत, लिंगायत, कालामुख आदि वेदवाह्य घोषित हो चुके थे।
शंकराचार्य की शैवता और वेदानुकूलता तो गोरक्षनाथ के पहले से
ही घोषित थी। अतः इन तथाकथित वेदवाह्य, जीर्णप्राय शैव सम्प्र-
दायों का नये संगठित रूप में पुनरुज्जीवन आवश्यक था ही जो
गोरक्षनाथ के हाथ से सम्पन्न हुआ।
ये महत्वपूर्ण कार्य सामान्य चरित्रवाले व्यक्ति से सम्पन्न नहीं हो
सकते थे। आदर्श के अनुकूल अपने चरित्र को खरा उतार कर
धर्मप्राण जनता के सम्मुख प्रस्तुत करनेवाला व्यक्ति इस प्रकार का
नेतृत्व सम्हाल सकता है। साधनागत पूर्णता के साथ चरित्रगत-
पूर्णता भी आवश्यक थी। सामान्य जनता को आकर्षित कर लेनेवाले
आकर्षक चरित्र और पूर्ण व्यक्ति से ही ये कार्य संभव थे। इसका
पूरा प्रमाण हमें उपर्युक्त स्रोतों में मिलता है। उनके ग्रंथों को देखने
से ज्ञात होता है कि वे संस्कृत के अच्छे संस्कारसम्पन्न ज्ञाता थे।
सिद्धसिद्धान्तपद्धति इसका प्रमाण है। इसी प्रकार मत्स्येन्द्रोद्धार के
लिए जब गोरक्ष कदली देश गये थे, तो वहाँ की स्त्रियोंने गोरक्ष के
रूपको देखकर उन्हें गोरक्ष से मिलने नहीं दिया। इस कथांश के
आधार पर लोगोंने यह अनुमान लगाया है कि गोरखनाथ बहुत
सुन्दर थे।¹⁷ मत्स्येन्द्रोद्धार के ही प्रसंग में लोककथाओं से पता
चलता है कि गोरखनाथ बहुत चतुर, समय देखकर कार्य करनेवाले
और विभिन्न प्रकार के वेष धारण करने में बहुत निपुण थे। विभिन्न
प्रकार की विद्याओं में निष्णात होने के कारण उन्हें इसमें तनिक
भी कठिनाई न होती थी। वे मृदंगवादन में निपुण थे। नृत्यकला
का भी ज्ञान था। सूक्ष्म रूप धारण करने की सिद्धि भी थी। लोक-
१७. गोरखनाथ और उनका युग—डा० रांगेय राघव, पृ० ४५-४६।

[ ११ ]
कथाओं में इन सबके प्रमाण मिलते हैं। इसी निपुणता के आधार
पर कहीं-कहीं उन्हें विद्याधर भी कहा गया है।१८
प्रायः देखा जाता है कि इस प्रकार के नैपुण्य, सौन्दर्य, गुणवत्ता
से सम्पन्न होने पर व्यक्ति चरित्र और नैतिकता की दृष्टि से क्षीण हो
जाता है अथवा उन्हें सम्हाल नहीं पाता। गोरक्षचरित्र गुण और
शक्ति दोनों का मणिकांचन योग है। ब्रह्मचर्यपरायण और हठयोगा-
चारनिष्ठ नैतिकता से सम्पन्न योगिसम्प्रदाय के विकास का मूल
श्रेय गोरक्षनाथ को ही है। ऐसे व्यक्ति की रचनाओं में प्राप्त उप-
देशों से यह बात स्पष्ट प्रकट होती है कि गोरक्ष ने इस प्रकार संयम-
पूर्ण ब्रह्मचर्यपरायण योग का उपदेश देकर यदि उसे जीवन में न
उतारा होता तो नाथयोगिसंप्रदाय का यह रूप आज न रहा होता।
उनकी कथनी और करनी में अभेद था, यह मानकर ही हम उनकी
रचनाओं के आधार पर उनके जीवनचरित्र और गुणों का निष्कर्ष
निकाल सकते हैं। चार महासिद्धों की पार्वती द्वारा जो परीक्षा ली
गयी, उसमें गोरक्ष को छोड़कर और सभी विचलित होगये। गोरक्ष
ने अविचल भाव से ऐसी अप्रतिम सुन्दरी के मातृरूप की ही
आकांक्षा की और उसकी गोद में बैठकर स्नेहामृत प्राप्त करने की
इच्छा व्यक्त की। इस कथांश के आधार पर दो बातें अनुमित की
जा सकती हैं। एक तो यह कि गोरक्ष नारी के केवल मातृरूप के
पूजक और समर्थक थे और उन्होंने जीवन के लिए ब्रह्मचर्य, संयम,
उद्वेगरहित हृदयमार्ग को उचित माना था। यदि उन्होंने इसे आच-
रित न किया होता तो वे निश्चय ही मत्स्येन्द्र के उद्धार के लिए न
जाकर स्वयं उसी में रम गये होते। उनकी रचनाओं में यह स्पष्ट
दिखायी पड़ता है कि वे कंचन और कामिनी दोनों को सहज
रहनी और साधनात्मक जीवन के लिए विघातक मानते थे। उद्धार
के बाद भी, कामिनी छूटने पर भी, कंचन के प्रति मोह मत्स्येन्द्र के
मन में शेष रह गया था। वे एक झोली में स्वर्णमुद्राएं भर लाये थे
और छिपा रखा था। गोरक्ष ने सामने के पहाड़ को ही योगबल से
स्वर्णमय बना दिया। मत्स्येन्द्र ने झोली नदी में फेंक दी। इससे
यह भी स्पष्ट है कि वे यौगिक सिद्धियों का प्रयोग परहितसाधन के
१८. वही, पृ० ४७-४८।

लिए ही करते थे। दूसरी कथाएं भी इस बात की पुष्टि करती हैं।
गोरखपुर में उन्होंने योगबल से अन्न वितरण किया। उस समय
यौगिक सिद्धियों का प्रयोग जनपीड़न के लिए करनेवाले लोग भी
थे। गोरखनाथ की उनसे नहीं पटी। दयानाथ अपनी फूँक से
पहाड़ी जंगलों में आग लगा देता था। चामत्कारिक रस्सी से
बंधवाकर रहस्यमय डंडे से लोगों को पिटवाता था। पहाड़ों को
आकाश में उड़ा देता था। अतः गोरखनाथ ने गोपीचन्द्र के आवा-
हन पर उससे कहा : 'लोगों को दुःख न दो, मैं तुम्हें और तुम्हारे
अनुवर्तियों तथा परवर्तियों को वरदान देता हूँ कि स्वच्छ श्वेत वस्त्रों
और अच्छे घोड़ों की कमी नहीं पड़ेगी।" फिर उन्होंने दयानाथ
को अपना शिष्य बनाया। कान फाड़कर कुण्डल पहनाएँ, काले
डोरों का साफा सिर पर रखा और दीनोधर वापस भेज दिया।१९
उनकी रचनाओं से और उनके सम्प्रदाय के संगठन से यह बात
सिद्ध होती है कि वे वर्णाश्रम-व्यवस्था के भेद-विभेदों को नहीं
मानते थे। स्वयं उनका सम्प्रदाय अपने को अति वर्णाश्रमी मानता
है। यवनों को भी उन्होंने अपने सम्प्रदाय में स्थान दिया था। मानव-
मात्र के प्रति समदृष्टि को वे आवश्यक मानते थे। एक कथा के अनु-
सार उन्होंने ज्वालादेवी के मंदिर में हिंसाविरहित मानसी पूजा का
सूत्रपात किया था। उनकी कुछ पंक्तियों के आधार पर यह निष्कर्ष
निकलता है कि वे भांग, मद्य, मांसादि से बहुत दूर रहते थे। एक
कथा से स्पष्ट होता है कि गोरख धनको योगी के लिए आवश्यक
नहीं मानते थे। गोरखने रांझा से कहा था—"मैं पृथ्वी पर सोता हूँ।
मेरे पास विस्तर नहीं, ओढ़ावन नहीं, कंकण पत्थरों पर सोता हूँ
और वियावान में रहता हूँ। योगी तो निर्धन होते हैं। धन उनके
पास नहीं होता।”२० उन्होंने अपने लिए कोई निवासस्थान नहीं
बनाया था। वे सदैव भ्रमणशील रहे। चार युगों में भिन्न-भिन्न
प्रदेशों में उनके निवास अथवा अवतार की जो बात कही जाती है,
वह वस्तुतः उन-उन प्रदेशों की उनकी यात्राओं का विवरण है।
रांझा की कथा में गोरख को यह कहते हुए उद्धृत किया गया है कि
युवती स्त्रीको 'बहन' और वयस्काको 'माता' का सम्बोधन दो।
१६. गोरखनाथ और उनका युग—पृ० ५१-५२।
२०. वही—पृ० ५४ पर उद्धृत ब्रिग्स।

[ १३ ]
'वयस्का स्त्रियों के प्रति उनके हृदय में अत्यन्त श्रद्धा थी। वे उनका
माता के समान आदर करते थे। गोरखनाथने स्त्री को केवल माता
के ही रूप में देखा, जो स्नेह से बालकको पालती है, जिसमें वासना
नहीं रहती।' 'युवती स्त्रियोंको गार्हस्थ्य-धर्म में पतिव्रता के रूप में
देखने के इच्छुक थे। उसके कामिनी रूप से उन्हें चिढ़ थी। वे
उसकी वासना से घृणा करते थे। लड़कियों का शीलपूर्ण होना उन्हें
भाता था। स्त्री के प्रति उनका विचार उनके सिद्धान्तों में बड़ा हाथ
रखता है।'२१ संयमपूर्ण जीवन व्यतीत करते हुए भी मस्त रहना
उनकी रहनी की विशेषता थी। ऐसी मस्ती में साधना भी निर्विघ्न
भाव से चलती रहे, यही उनकी आकांक्षा थी।२२
उनके पाण्डित्य के सम्बन्ध में भी अब प्रायः संदेह नहीं रह गया
है। 'अमरौघशासनम्' और 'महार्थमंजरी' यदि उन्हीं की रचनाएँ
हैं तो निश्चय ही उन्होंने भारतीय दर्शनों का अच्छा अध्ययन किया
था। उनकी हिन्दी रचनाओं से यह बात स्पष्ट होती है कि वे
पाण्डित्य को महत्व नहीं देते थे।२३ गोरक्ष का अपने समकालीन
सिद्धों से बहुत संघर्ष था। कहा जाता है कि गोरखनाथ और
कृष्णपाद या कान्हुपा की साधनापद्धति में भी संघर्ष था। संघर्ष का
दूसरा कारण यह था कि गोरखनाथ अपने भक्तों, अनुयायियों और
विपत्ति में पड़े लोगों की सहायता के लिए हमेशा दौड़ पड़ते थे।
२१. वही—पृ० ५६।
२२. 'हसिवा खेलिवा रहिवा रंग। काम क्रोध न करिबा संग॥
हसिबा खेलिवा गाइबा गीत। दिढ करि राखि आपना चीत ॥७॥
हसिवा खेलिवा धरिबा ध्यान। अहिनिसि कथिबा ब्रह्म गियान ॥
हसै खेलै न करै मन भंग। ते निहचल सदा नाथ के संग ॥८॥
गोरखबानी, सबदी, पृ० ३-४।
२३. 'वेद कतेव न बांणी बांणी। सब ढंकी तलि आंणी ॥
गगनि सिषर महि सबद प्रकास्या। तह बूझे अलष बिनाणी ॥४॥
वेदे न सास्त्रे कतेबे न कुराणे पुस्तके न बांच्या जाई।
ते पद जाना विरला जोगी और दुनी सब धंधे लाई ॥६॥
—गो० बा०, पृ० २-३।
५

कान्हिफा, जालन्धर, दयानाथ आदि के साथ उनका संघर्ष कथाओं
में प्रसिद्ध है। यह भी संभव है, जैसा कुछ कथाओं से मालूम पड़ता
है कि भिन्न साधनमार्ग, जो लोगों को सही रास्ते नहीं ले जाते थे,
भी इसके कारण रहे हों। तत्कालीन प्रचलित विभिन्न साधन-
संप्रदायों का उनके विरूप से उद्धार और नाथमत में उनका संग-
ठन, यह भी उनका एक लक्ष्य था। इसके लिये उन्हें विभिन्न प्रकार
के पराक्रम दिखाने पड़े और उनसे सम्बद्ध अनेक कथाएँ, किंवदन्तियाँ
तत्तत्प्रदेशों में प्रचलित हो गयीं। अपने संप्रदाय और उसके अनु-
यायियों की श्रेष्ठता के लिए उन्हें चिंता रहती थी। इसीलिए वे
अपने अनुयायियों को चित्त की दृढ़ता का उपदेश देते थे। भारत में
इतना भ्रमण करनेवाले और जनसमाज के संपर्क में आनेवाले,
दुखियों के दुःख को देखकर तुरत दौड़ पड़नेवाले के लिए भी चित्त
की दृढ़ता अत्यधिक आवश्यक थी। उनका कुछ हिंसक यवनों से
भी पाला पड़ा था और उन्होंने उन्हें हिंसा से विरत करने के लिए
उपदेश भी दिया था। प्रसिद्ध है कि बहुत से मुसलमान भी उनके
शिष्य हो गये थे। हिन्दी की रचनाओं के अनुसार विभिन्न सांप्र-
दायिक संन्यासियों के आडंबर की ओर भी उनकी दृष्टि थी और वे
नाथयोगियों को उनसे मुक्त रखने के भी अभिलाषी थे। कार्पटिक,
नागा, मौनी, दूधाधारी आदि ऐसे ही संन्यासी थे। २४
गोरक्षनाथ का व्यक्तित्व और कृतित्व विभिन्न किंवदन्तियों
और लोककथाओं से इतना आवृत है तथा साम्प्रदायिकों द्वारा इस
प्रकार की अनैतिहासिक बातें इतनी अधिक मात्रा में प्रसारित की
गयी हैं और वे परस्पर इतनी विरुद्ध हैं कि कुछ लोग गोरक्षनाथ
को पौराणिक प्रसिद्धिवाला व्यक्ति मानने लगे हैं। अब तक उनकी
ऐतिहासिकता और समय के सम्बन्ध में जितना काम हुआ है,
वह संक्षेप में नीचे प्रस्तुत किया जा रहा है। इन सबके आधार पर,
मोटे तौर पर, इतना तो निश्चय हो गया है कि गोरक्षनाथ एक
ऐतिहासिक व्यक्ति थे और शंकराचार्य के पश्चात् और रामानुजा-
चार्य के पूर्व उनका आविर्भाव हुआ था। वस्तुतः गोरक्षनाथ के
समय का विचार अन्य नाथसिद्धों अथवा समकालीन सिद्धों के
कालविचार से पूर्णतया पृथक् नहीं किया जा सकता।
२४. गोरखबानी—सबदी ३६-४०, पृ० १५, सबदी ७, ९-१०, पृ० ३-४।

[ १५ ]
गोरक्षनाथ की ऐतिहासिकता और उनके काल का निर्णय
करने में बहुत सी पौराणिक कथाएँ, किंवदन्तियाँ, साम्प्रदायिक
विश्वास आदि बाधक हैं। कुछ विद्वान् इन सबका कालनिर्णयादि में
उपयोग भी करते हैं। कनफटा लोगों का कहना है कि उनका
सम्प्रदाय सृष्टि के पूर्व भी विद्यमान था। विष्णु जब कमल से प्रकट
हुए तब उस समय गोरक्ष पाताल में थे। सृष्टि की समस्या खड़ी होने
पर विष्णु पाताल गये और गोरक्षनाथ से सहायता की याचना
की। गोरक्ष ने दयाकर अपनी धूनी से एक मुट्ठी विभूति दी और
कहा कि यदि तुम इसे जल के ऊपर छिड़क दोगे तो तुम सृष्टि करने
में समर्थ होगे। विष्णु ने वैसा ही किया और ब्रह्मा, विष्णु और
शिव गोरक्ष के प्रथम शिष्य हुए। २५ विभिन्न स्थानों पर विभिन्न युगों
में गोरक्ष के अवतरित होने की कथा उनके अतिमानव होने की
ओर संकेत करती है। २६ यह भी कहा जाता है कि गोरक्षनाथ
कलियुग में शेषनाग के रूप में प्रकट हुए। २७ नेपाल से कुछ ऐसे
चित्र भी मिले हैं जिनमें गोरक्ष नागों से आवृत हैं। उनके शीर्ष
भाग पर शेषनाग की छाया है। एक परम्परा के अनुसार गोरखनाथ
का बाबा फरीद से भी सम्पर्क था जिन्होंने १२४४ ई० में गिरनार
की यात्रा की थी। उनका एक स्मारक भी गिरनार में है। २८ गोरख-
नाथ के शिष्यों की सूची काफी लम्बी है। ब्रिग्स ने हठयोगप्रदीपिका
के बहुत से सिद्धों को उनका शिष्य माना है। वह सूची इस
प्रकार है—
विरूपाक्ष, विलेशया, मन्थान, भैरव, सिद्धिवुद्ध, कंथड़ी, करएटक,
सुरानंद, सिद्धिपाद्, चर्पटी, काणेरी, पूज्यपाद, नित्यनाथ, निरंजन,
कपालि, बिंदुनाथ, कंकचंडेश्वर, अल्लाम, प्रभुदेव, घोड़ा, चोली,
भानुकी, नारदेव, खण्ड, कापालिक, तथा अन्य। २९
२५. गोरखनाथ ऐंड कनफटा योगीज–ब्रिग्स, पृ० २२८ (ब्रिग्स द्वारा कथित
इस कथा में पौराणिक असंगति है)।
२६. वही–पृ० २२६ ।
२७. वही ।
२८. वही–पृ० २३० ।
२९. वही–पृ० २३४ ।

[ १६ ]
ऐसा प्रतीत होता है कि ब्रिग्स ने हठयोगप्रदीपिका में दिये गये
नामों को ठीक से पढ़ा नहीं है। खण्ड और कापालिक वस्तुतः दो
सिद्ध नहीं हैं और वास्तविक नाम है चण्डकापालिक। उसी प्रकार
घोड़ाचौली भी एक ही सिद्ध का नाम प्रतीत होता है। ऐसे ही और
कितने दोष बताये जा सकते हैं। वस्तुतः गोरखनाथ के शिष्यों की
संख्या और नाम का संधान अभीतक ठीक से हुआ नहीं है। उड़ीसा
के उनके शिष्य मल्लिकानाथ का पता अभी अभी लगा है जिनका
जीवनवृत्त मल्लिकामकरंद नाम के ताड़पत्र के हस्तलेख के इतिहास-
खण्ड में मिलता है।३०
गोरक्षनाथ से सम्बद्ध जो कथाएं मिलती हैं, उनमें से अनेक
गूगा चौहान, राजा रसालू, पूरण भगत आदि से संबंधित हैं जिनका
उपयोग विद्वानों ने गोरखनाथ के कालनिर्णय में किया है ! गूगा
का समय १२ वीं शताब्दी के पूर्व बताया गया है। राजा रसालू का
समय आठवीं शती माना गया है। भर्तृहरि, गोपीचन्द्र, भोज,
रानी पिंगला आदि की कथाओं के आधार पर ब्रिग्स ने गोरखनाथ
का समय ११वीं ई० शती के पूर्व बताया है।३१ राजपूताने के मेवाड़
के बाप्पा से संबंधित गोरक्ष का समय ९वीं ई० शती से १२वीं ई०
शती के बीच रहा होगा।३२ नेपाली वंशावली पर्वतिया के अनुसार
मत्स्येन्द्रनाथ गोरक्षनाथ का मिलन नेपाल में नरदेव ( ९वीं ई० शती
का मध्यकाल ) के समय में हुआ था।३३ इस प्रकार की बहुत सी
सामग्रियों की परीक्षा कर ब्रिग्स ने यह निश्चय किया कि जब तक
और नयी सामग्री उद्घाटित नहीं होती तब तक तो यही निष्कर्ष है
कि गोरखनाथ का आविर्भाव १२वीं ई० शताब्दी के पूर्व हुआ था।
अधिक संभावना तो यह है कि ११वीं ई० शताब्दी के प्रारम्भ में ही
३०. नाथ और सन्त साहित्य का तुलनात्मक अध्ययन—डा० नागेन्द्रनाथ
उपाध्याय, परिशिष्ट २ ।
३१. गोरखनाथ ऐंड कानफटा योगीज—ब्रिग्स—पृ० २३५-२३६, २३६, २४२,
२४४, २५१ ।
३२. वही पृ०-२४५-२४७ ।
३३. वही, पृ० २४८ ।

[ १७ ]
उनका आविर्भाव हुआ और वे वंगाल के पूर्वी भाग से आये थे ।
इसी प्रकार एक दूसरे विद्वान् डा० मोहनसिंह ने संभावना व्यक्त की
है कि वे ईसा की ६वीं शताब्दी में विद्यमान थे और पंजाब के
निवासी थे ।
नेपाल के राजनीतिक और धार्मिक इतिहास से उपलब्ध तथ्यों,
शैव धर्म और नाथयोगी सम्प्रदाय के विकास के इतिहास से उपलब्ध
तथ्यों तथा विभिन्न सम्प्रदायों की परम्पराओं के आधार पर प्रो०
सिल्वा लेवी, डा० शहीदउल्ला जैसे विद्वानोंने निष्कर्ष निकाला है कि
नाथयोगी सम्प्रदाय के संस्थापक सातवीं शताब्दी में अवश्य विद्य-
मान थे । वाक्यपदीयकार भर्तृहरि के आधार पर लोग गोरक्षनाथ
को छठीं शताब्दी का मानते हैं । एक साम्प्रदायिक परम्परा यह भी
मानती है कि जेसस क्राइस्ट ने हिमालय के एक नाथयोगी ( गोरख-
नाथ ? ) से योगशिक्षा ग्रहण की थी ।३४
डा०हजारीप्रसाद द्विवेदी ने विभिन्न दंतकथाओं और ऐतिहासिक
सामग्री के आधार पर जो निष्कर्ष निकाले हैं, उनसे कई महत्वपूर्ण
बातों का पता चलता है । ( १ ) मत्स्येन्द्रनाथ और जालंधरनाथ
समसामयिक थे तथा इन दोनों के शिष्य थे क्रमशः गोरक्षनाथ और
कानुपा या कृष्णपाद । अतः इनमें से किसी एक का समय निश्चित
हो जाने पर शेष का समय निश्चित हो सकता है । ( २ ) कौलज्ञान-
निर्णय के लेखक मत्स्येन्द्रनाथ ११वीं शताब्दी के पूर्व हुए थे । ( ३ )
अभिनवगुप्त द्वारा संस्तुत ‘मच्छन्दविभु’ मत्स्येन्द्रनाथ ही हैं । अभि-
नवगुप्त ने ‘ईश्वरप्रत्यभिज्ञा’ की बृहती वृत्ति सन् १०१५ में लिखी
थी और क्रमस्तोत्र की रचना सन् ६६१ में की थी । इस प्रकार मत्स्ये-
न्द्रनाथ इसके पूर्व आविर्भूत हुए होंगे । ( ४ ) मत्स्येन्द्रनाथ (मीनपा)
राजा देवपाल के राज्यकाल ( सन् ८०६-८४६ ई० ) में हुए थे । अतः
मत्स्येन्द्रनाथ नवीं शताब्दी के मध्यभाग और अधिकसे अधिक
अन्त्य भाग तक वर्तमान थे । ( ५ ) गोविंदचन्द्र या गोपीचन्द्र
जालंधर के शिष्य कानुपा के शिष्य थे । दक्षिण के राजा राजेन्द्र
चोल ने माणिकचन्द्र के पुत्र गोविंदचन्द्र को पराजित किया था ।
३४. नाथयोग ( अंग्रेजी ) — प्रो० अक्षयकुमार बनर्जी, पृ० ५ ।

[ १८ ]
'गोविंदचन्द्रेर गान' के अनुसार गोविंदचन्द्र का किसी दाक्षिणात्य
राजा से युद्ध १०६३-१११२ ई० में हुआ था । इस पर यह अनुमान
किया जा सकता है कि जालंधर का समय इससे सौ वर्ष पूर्व
(लगभग ६६३ई०) रहा होगा । मत्स्येन्द्रनाथ का समय इससे भी पूर्व
होना चाहिए । ( ६ ) वज्रयानी सिद्ध कह्नपा, जिन्होंने अपने गानों
में जालंधरनाथ का नाम लिया है, तिब्बती परंपरा के अनुसार राजा
देवपाल ( ८०६-८४६ ई० ) के समकालीन थे । अतः जालंधरपाद
का समय इससे कुछ पूर्व ठहरता है । ( ७ ) चालुक्यराज मूलराज
( ६६३ ई० ) ने अणहिल्लपुर के शिवमंदिर का प्रबंधक कन्थड़ी
नामक सिद्ध को बड़े छल-बल-कौशल से बनाया था । इस सिद्ध
के सारे लक्षण नाथपंथी योगी के हैं, ऐसा प्रबंधचिंतामणि से
पता चलता है । ऊपर के प्रमाणों के आधार पर नाथमार्ग के आद्य
प्रवर्तकों का समय नवीं शताब्दी का मध्यभाग ही उचित जान
पड़ता है ।३५
ऊपर के विवरण और विवेचन से यह निश्चत हो गया है कि
मत्स्येन्द्रनाथ और गोरक्षनाथ का समय ६ वीं ई० शती के मध्य
अथवा अन्त्य भाग में होना चाहिए । अभी तक जितने भी प्रमाणों
का विचार लोगों ने किया है, उनमें उपर्युक्त विचार अपेक्षाकृत
अधिक संगत और प्रामाणिक मालूम पड़ता है। डा० कल्याणी
मल्लिक ने शताब्दी के अनुसार सामग्री का विभाजन कर यह
निश्चय करने का प्रयत्न किया है कि गोरक्षनाथ का समय १२ वीं
ई० श० के पूर्व किसी समय माना जा सकता है। उन्होंने कुछ प्रमाण
ऐसे भी दिये हैं, जिनसे डा० द्विवेदी के मत की पुष्टि होती है ।
मालवराजकन्या मयनामती के पति माणिकचन्द्र के गीत रंगपुर के
पाशुपत शैव गाते थे । वे लोग गोरक्षनाथ की गुरुरूप में पूजा करते
थे । पैग-साम-जान-ज्वैन के अनुसार शंकरदिग्विजय के परवर्ती
काल में मगध के, श्रीहर्ष के ज्येष्ठ पुत्र के राजत्वकाल में, बंगदेश में
माणिकचन्द्र के पिता राज्य करते थे । शंकर का जन्मकाल ७८८ ई०
है। गोरक्षनाथ ने नाथ संप्रदाय के दर्शन के साथ उपनिषद्दर्शन का
सामंजस्य किया है। अतएव वे शंकर के बहुत परवर्ती नहीं हो
३५. नाथसिद्धों की वानियाँ—डा० हजारीप्रसाद द्विवेदी, भूमिका, पृ०-५-६ ।

[ १६ ]
सकते । उनका दूसरा प्रमाण यह है कि आठवीं शताव्दी के प्रारंभ
में हिन्दू-मुसलमानों में जो संघर्ष हुआ, उसमें गोरक्ष के शिष्य राजा
रसालू ने विशिष्ट स्थान ग्रहण किया । रसालू और पूरन भगत दोनों
ही गोरक्ष के शिष्य थे ।३६ अन्यत्र डा० कल्याणी मल्लिक ने यह
स्वीकार किया है कि गोरक्षनाथ का समय दसवीं शताव्दी के बाद
निश्चय होना चाहिए।३७
इस प्रकार गोरक्षनाथ के समय के सम्बन्ध में स्पष्टतः दो मत
हैं । एक मत गोरक्षनाथ का जीवनकाल स्पष्टतः ईसा की नवीं
शताव्दी का मध्यभाग मानता है और दूसरा मत उन्हें १० वीं से
१२ वीं शताव्दी के मध्य किसी भी समय विद्यमान मानता है ।
दोनों मतों में पर्याप्त अन्तर है । डा० मल्लिक के कुछ प्रमाणों का
उपयोग प्रथम मत की पुष्टि के लिए भी किया जा सकता है । सब
देखने पर प्रथम मत ( ६ वीं ई० शताव्दी का मध्यभाग ) ही अधिक
मान्य प्रतीत होता है ।
यद्यपि गोरक्षनाथ का समय अब प्रायः निश्चित हो गया है,
लेकिन उनके नाम से मिलनेवाली सभी रचनाओं का कालनिर्णय
अभी तक नहीं हो सका है । गोरक्षनाथ के नाम से संस्कृत, अपभ्रंश
और हिन्दी तीनों भाषाओं में रचनाएँ मिलती हैं ।
ब्रिग्स ने गोरक्षनाथ के गोरक्षशतक को उनकी सबसे प्रामा-
णिक रचना माना है। इसी गोरक्षशतक के बहुत से नाम
मिलते हैं और इसी का संस्करण तथा परिवर्द्धन भी बहुत
हुआ है । प्रथम शतक के गोरक्षकल्प, गोरक्षपद्धति, गोरक्षज्ञान,
ज्ञानशतक, ज्ञानप्रकाशशतक आदि ऐसे ही नाम हैं । गोरक्षपद्धति की
हिन्दी टीका में बहुत से ऐसे श्लोक भी मिलते हैं जो उसी रूप में
हठयोगप्रदीपिका में भी मिलते हैं । गोरक्षशतक में दो शतक हैं ।
संपूर्ण ग्रंथ के गोरक्षशतक टीका, गोरक्षशतक टिप्पण, गोरक्षकल्प,
३६. नाथसंप्रदायेर इतिहास दर्शन ओ साधनाप्रणाली—डा० कल्याणी
मल्लिक, पृ० ३४-३६ ।
३७. सिद्धसिद्धान्तपद्धति ऐंड अदर वर्क्स आव नाथयोगीज—डा० कल्याणी
मल्लिक, इंट्रोडक्शन, पृ० १० ।

[ २० ]
गोरक्षपद्धति, योगसिद्धान्तपद्धति और सिद्धान्तपद्धति नामक अनेक
नामान्तर और रूपान्तर हैं। गोरक्षपद्धति में इसे गोरक्षसंहिता भी
कहा गया है। अतः व्रिग्स ने अनुमान लगाया है कि गोरक्षशतक
इस संप्रदाय का मूलग्रन्थ है। इसे प्रमाण और परम्पराएं गोरक्ष-
नाथकृत मानती हैं तथा इसे १२ वीं शताब्दी की रचना स्वीकार
करती हैं। लेकिन गोरक्षसंहिता, जो आजकल अनुपलब्ध है और
गोरक्षपद्धति का तुलनात्मक अध्ययन करने से यह बात साफ हो
जाती है कि गोरक्षसंहिता अपेक्षाकृत अधिक प्राचीन है। गोरक्ष-
पद्धति गोरक्षसंहिता के बहुत बाद का ग्रन्थ मालूम होता है। ऐसा
मालूम होता है कि गोरक्षपद्धति का संग्राहक गोरक्षसंहिता और
हठयोगप्रदीपिका दोनों को अपना आधार मानता है। गोरक्षपद्धति
में गोरक्षसंहिता का उल्लेख कई बार हुआ है। अतः गोरक्षपद्धति
एक स्वतन्त्र ग्रन्थ है।
गोरक्षशतक के समान ही सिद्धसिद्धान्तपद्धति भी एक महत्वपूर्ण
ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ के आधार पर आगे चलकर सिद्धसिद्धान्तसंग्रह
और गोरक्षसिद्धान्तसंग्रह जैसे ग्रन्थ बने बताये जाते हैं। इन ग्रन्थों
में सिद्धसिद्धान्तपद्धति के उद्धरण भी मिलते हैं। अमरौधशासनम्
और महार्थमंजरी ग्रन्थ भी गोरक्षकृत ही माने जाते हैं और विभिन्न
दृष्टियों से महत्वपूर्ण हैं। शैवागमों से शैवनाथ मत का सम्बन्ध-
निरूपण करने के लिए "अमरौघशासनम्" महत्वपूर्ण ग्रंथ है। इस
ग्रन्थ की रचनातिथि तथा लिपिकाल अज्ञात हैं। सांख्ययोग, काश्मीर
शैवमत और तंत्रदर्शन के ३६ तत्वों के साथ सम्बन्ध-विचार के लिए
महार्थमंजरी विचारणीय ग्रन्थ है। भाषा की दृष्टि से भी इसका
महत्व कम नहीं है। कुछ लोग इसकी भाषा काश्मीरी अपभ्रंश
मानते हैं। इन आधारों पर दार्शनिक, साधनात्मक तथा सांप्रदायिक
धारा के विवेचन की दृष्टि से गोरक्षनाथ की ये चार रचनाएँ बहुत
महत्वपूर्ण और प्रामाणिक मानी जा सकती हैं—(१) सिद्धसिद्धान्त-
पद्धति, (२) महार्थमंजरी, (३) गोरक्षसंहिता, (४) अमरौध-
शासनम्। डा० हजारी प्रसाद द्विवेदी ने सूचित किया है कि अमनस्क
नामक ग्रन्थ की एक प्रति बड़ौदा लाइब्रेरी में है और गोरक्षसिद्धांत-

[ २१ ]
संग्रह में बहुत से वचन उद्धृत हैं। ३८ लेकिन इसकी प्रति भी ढूंढ़े
नहीं मिलती। अमनस्क ग्रन्थ तो अब प्रकाशित ही हो रहा है।
द्विवेदी जी ने बताया है कि पं० प्रसन्नकुमार कविरत्न ने गोरक्ष-
संहिता को १८६७ में छपाया था ! हमने एक दूसरा संस्करण काशी
हिन्दू विश्वविद्यालय के गायकवाड़ ग्रन्थालय में देखा, जिसकी
टंकित प्रति मेरे पास सुरक्षित है। यह संस्करण श्री इन्द्र जी शर्मा
द्वारा संवत् १६५० में प्रकाशित कराया गया था। इसका प्रकाशन
स्थान काठियावाड़ का प्रभासपाटण स्थान है और मुद्रण स्थान
अहमदाबाद है। यह संस्करण भी बहुत जीर्ण अवस्था में मुझे मिला।
द्विवेदी जी ने आगे और बताया है कि इसकी एक प्रति नेपाल दर-
बार लाइब्रेरी में भी है जिसका कुछ अंश डा० बागची ने कौलवलि-
निर्णय की भूमिका में उद्धृत किया है। इसके बहुत से अंश मत्स्येन्द्र-
नाथ के अकुलवीरतन्त्र में भी अविकल रूप में मिलते हैं। ३९ गोरक्ष
संहिता भी बहुत महत्वपूर्ण ग्रंथ है और अब अप्राप्य है। अतः
अमनस्क के बाद, उपर्युक्त सामग्री के आधार पर, इसका भी संपादन-
प्रकाशन होना चाहिए।
गोरक्षनाथ की हिन्दी रचनाएं भी अब पर्याप्त मात्रा में प्रका-
शित हो चुकी हैं। सबसे पहले डा० पीताम्बरदत्त बड़थ्वाल ने हस्त-
लिखित पोथियों के आधार पर 'गोरखबानी' का प्रकाशन कराया
जिसमें प्रमुख तेरह रचनाओं में सबदी अंश को सबसे अधिक प्रामा-
णिक माना गया है। इनके अतिरिक्त १४ रचनाएं और संपादित
हैं। डा० बड़थ्वाल द्वारा संग्रहीत नाथसिद्धों की बानियों का दूसरा
भाग बहुत बाद में पर्याप्त नयी सामग्री के साथ डा० हजारीप्रसाद
द्विवेदी ने प्रकाशित कराया। इसके पूर्व ही डा० कल्याणी मलिक ने
सिद्धसिद्धान्तपद्धति और अन्य नाथयोगियों की रचनाओं के साथ
गोरक्षनाथ के नाम से प्रसिद्ध 'गोरख उपनिषद्' नाम की रचना
प्रकाशित की। कुछ लोग गोरक्षनाथ को हिन्दी का प्रथम गद्यलेखक
मानते हैं। भाषा की दृष्टि से भी गोरक्षनाथ की रचनाएं बहुत
३८. नाथ संप्रदाय — डा० हजारीप्रसाद द्विवेदी, पृ० ६८ ।
३६. वही पृ० ६६-१००

[ २२ ]
महत्वपूर्ण मानी जाती हैं, यद्यपि उनकी भाषा बहुत बदल गयी
है।४०
गोरक्षनाथ के दर्शन के मूल आधार ग्रंथ संस्कृत में हैं। ऊपर
जिन संस्कृत रचनाओं की ओर संकेत किया गया है, उनमें गोरक्ष-
दर्शन का तत्त्वविज्ञान बहुत ही पुष्ट रूप में प्रकाशित हुआ है।
अन्य बहुत से भारतीय दर्शनों की तरह ही गोरक्ष-दर्शन के तत्व-
विज्ञान का मूलाधार सांख्य का तत्वविज्ञान है। सिद्धसिद्धान्त-
पद्धति में काश्मीर शैव दर्शन के ३६ तत्वों का पूरा समाहार प्रतीत
होता है। वस्तुतः इस तत्त्वविज्ञान का मुख्य लक्ष्य नाथों का 'पिण्ड-
ब्रह्माण्डवाद' है। पिण्ड और ब्रह्माण्ड की समतत्वता और सम-
पदार्थता सिद्ध करने के लिए दार्शनिक आधार के रूप में इस तत्त्व-
विज्ञान का विकास किया गया है, ऐसा प्रतीत होता है। डा०
हजारीप्रसाद द्विवेदी, डा० कल्याणी मल्लिक आदि ने इस तत्त्व-
विज्ञान का विस्तार से विवेचन किया है।
प्रलयावस्था में शिव कार्य-कारण के चक्र-संचालन से विरत, कुल
अकुल-भेद से परे और अव्यक्त रहते हैं। इस अवस्था को सिद्धसिद्धां-
तपद्धति में 'स्वयं' कहा गया है।४१ इस परम शिव में सिसृक्षा उत्पन्न
होने पर उन्हें सगुण शिव कहा जाता है। यह सिसृक्षा ही शक्ति
है जिसके उत्पन्न होते ही शिव और शक्ति दो तत्व हो जाते हैं जो
इस स्थिति में अभिन्न रहते हैं। इसके बाद इन दोनों तत्वों का पांच
अवस्थाओं में विकास होता है, जो संक्षेप में इस प्रकार है-
शिव शक्ति
१-अपर : १--निजा (स्फुरित होने की पूर्ववर्तिनी,
स्फुरित होने को उपक्रान्त)
४०. विस्तार के लिए देखिए, (१) नाथ संप्रदाय पृ० ६८-१०२, (२) नाथ
संप्रदायेर इतिहास, दर्शन ओ साधनाप्रणाली, पृ० १२१-१५०, (३) नाथ
सिद्धों की बानियां डा० हजारीप्रसाद द्विवेदी, (४) सिद्धसिद्धान्तपद्धति
ऐंड अदर वर्क्स-डा० कल्याणी मल्लिक, (५) नाथ और संत साहित्य :
तुलनात्मक अध्ययन-डा० ना० उपाध्याय, पृ० २७-३४।
४१. कार्यकारणकर्तृत्वं यदा नास्ति कुलाकुलम् । अव्यक्तं परमं तत्वं स्वयं नाम
तदा भवेत् ॥ १-४ । सिद्धसिद्धान्तसंग्रह, रचयिता : बलभद्र, पृ० १ ।