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सर्वकोश
अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj

गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

पृष्ठ 38, कुल 128 में से

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पृष्ठ 38

इस अन्तिम रचना 'गोरक्षशब्दनिरुक्तिः' में ऐसा दिखाया गया
है कि गोरक्ष शब्द बहुत प्राचीन साहित्य में मिलता है और उद्धरण-
कर्त्ता का अभिप्राय यह मालूम पड़ता है कि वह इस प्रयत्न से गोरक्ष
की प्राचीनता सिद्ध करना चाहता है। प्रमाण के लिए अथर्ववेद,
ब्रह्माण्डपुराण, स्कन्दपुराणान्तर्गत केदारखण्ड (अध्याय ४२, ४५,
४६, ७४), शिवपुराण, महाकाल योगशास्त्र कल्पद्रुम, गोरक्षगीता,
मार्कण्डेयपुराण, शाक्तप्रमोद आदि के विभिन्न उद्धरणों को प्रस्तुत
कर यह कहा गया है कि गोरक्षनाथ का निवासस्थान केदारखण्ड
के दक्षिण भाग में है, जहाँ सर्वदा अत्यन्त उष्ण जल विद्यमान रहता
है। अनुमानतः यह स्थान कांगड़ा अथवा हिंगलाज हो सकता है।
शिवपुराण के अनुसार गोरक्षनाथ शिवावतार थे। गोरक्षगीता में
बताया गया है कि इन्द्राणी के पातिव्रत की रक्षा में गोरक्षनाथ ने
सुराचार्य बृहस्पति की सहायता की थी। मार्कण्डेयपुराण में मार्कण्डेय
और मत्स्येन्द्रादि के द्विविध हठयोगी मतों की ओर संकेत है।
स्कंदपुराण के केदारखण्ड में नवनाथों में गोरक्ष की भी गणना की
गयी है। प्राणतोषिणी में नवनाथ वर्णनप्रसंग में विमलानन्दनाथ
नाम से श्रीनाथ (गोरक्षनाथ) का ही स्मरण किया गया है। इसी
प्रकार शाक्तप्रमोद में भी श्रीनाथ का वर्णन है। स्कंदपुराण के हिम-
वत्खण्ड में, विरूपाक्षतीर्थयात्रा के प्रकरण में भी गोरक्ष की सिद्धि-
प्रदायकता का वर्णन है।$^{१६}$ गोरक्ष शब्द की जो व्याख्याएं दी गयी
हैं और विभिन्न ग्रंथों में जिन-जिन प्रसंगों में उनके उल्लेख मिलते
हैं, उनसे श्रीगोरक्षनाथ की साधनात्मक असाधारणता, चारित्रिक
उच्चता, हठयोगाचार्य्यता की ओर संकेत होता है।
गोरक्षनाथ के जीवनवृत्त पर प्रामाणिक सामग्री के अभाव में
उनके चरित्र और व्यक्तित्व पर भी प्रामाणिक रूप में कुछ कहना
कठिन है। उनके नाम से प्राप्त रचनाओं, किंवदन्तियों, विश्वासों,
कथाओं के आधार पर कुछ अनुमान अवश्य किया जा सकता है।
कोई प्रामाणिक सामग्री न होने के कारण ही विद्वान् लोग गोरक्ष-
नाथ के चरित और व्यक्तित्व पर अभी तक कुछ न लिख सके थे।
लेकिन पूर्ण अभाव की स्थिति में यदि कुछ अनुमान के आधार पर


१६ वही, पृ० ८-१२ ।