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सर्वकोश
अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj

गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

पृष्ठ 100, कुल 128 में से

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पृष्ठ 100

[ २८ ]
दर्शनात् स्पर्शनात्तस्य त्रिसप्तकुलसंयुताः ।
जना मुक्तिपदं यान्ति किं पुनस्तत्परायणाः१ ॥ १३ ॥
उसके दर्शन और स्पर्श से अपने २१ पुश्तों के साथ लोक मुक्ति पद को
प्राप्त होते हैं । उस देश के निवासी या जन के सेवकों की तो बात ही
क्या है ? ॥ १३ ॥
नोर्ध्वाधः कुण्डलीभेद उन्मन्याश्चैव न क्रमः ।
अनुसन्धानमात्रेण योगोऽयं सिद्धिदायकः ॥ १४ ॥
इस योगमें ऊर्ध्वकुण्डली या अधःकुण्डलिनी भेद नहीं है। उन्मनी, मनो-
न्मनी का भी क्रम नहीं है। यह योग केवल अनुसन्धान मात्र से २सिद्धि प्रदान
करता है ॥ १४ ॥
ऊर्ध्वमुष्टिरधोदृष्टिरूर्ध्वभेदस्त्वध : शिराः ।
धरायन्त्रविधानेन जीवन्मुक्तो भविष्यति ॥ १५ ॥
ऊपर की ओर मुष्टि, नीचे की ओर दृष्टि, ऊपर को भेद और नीचे की
ओर सिर कर “धरायन्त्र” की विधि से साधक जीवन्मुक्त होगा ॥ १५ ॥
१. तुलनीय—कृतार्थौ पितरौ तेन धन्यो देशः कुलं च तत् ।
जायते योगवान् यत्र दत्तमक्षय्यतां व्रजेत् ॥
दृष्टः सम्भाषितः स्पृष्टः पुंप्रकृत्योर्विवेकवान् ।
भवकोटिशतापातं पुनाति वृजिनं नृणाम् ॥ (ब्रह्मवैवर्तपुराण)
२. शास्त्रों में तीन प्रकार के योग का वर्णन है—(१) आणवयोग (२) शाक्त-
योग और (३) शांभवयोग ।
आणवयोग में शरीर, प्राण, मन, बुद्धि को लेकर साधना होती है,
जैसे कि आसन द्वारा देहजय, मुद्रा-बंध-प्राणायाम द्वारा प्राणजय, ध्यान
द्वारा मनजय इत्यादि ।
जब कुण्डलिनी शक्ति जाग जाती है तब शाक्तयोग (शक्तिअनुसंधान)
होता है । ऐसा होता है कि शक्ति सहस्रार में तो पहुँच गयी है किन्तु
शिवत्वबोध नहीं है । इसलिये बोध करने का जो उपाय है वह शांभ-
वयोग ( स्वरूप अनुसंधान ) है, जो अनुसंधानात्मक है ('शिवोऽहम्') ।