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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 94

माड़ौका युद्ध । ८६ ४१.
पहिलै लोहै तुम्हरी राखैं फिरिकचलोहियादेखुहमार १६४
सुनिकै बातें ये ऊदन की अनुपी भाला लीन उठाय ॥
दूनों अँगुरिन भाला तौलै कालीनाग ऐस मन्नाय १६५
छुटिगा भाला जो हाथेते कम्मर मचा ठनाका जाय ॥
घोड़ा बेंदुला बायें दैगा औबचिगयो लहुरवाभाय १६६
हँसिकै बोल्यो तब अनुपीते यहु रणबाघु उदयसिंहराय ॥
दूधु लरिकई माँ पायो ना तुम्हरे मरे चढ़ै ना घाय १६७
अब तुम सुमिरौ यहिसमयामाँ जो गाढ़े माँ होयसहाय ॥
वार हमारी ते बचिजायो घरमाँ छठी धरायौ जाय १६८
अब ना बचिहौ रणखेतनमें अनुपी सम्हरि होउ हुशियार ॥
इतना कहिकै बघऊदन ने नंगी खैंचिलीन तलवार १६६
मरी सिरोही तब अनुपी के धरती गिरयो भरहराखाय ॥
मरिगा अनुपी रणखेतन माँ टोंडरमलौ पहुँचा आय १७०
औ ललकारा बघऊदन का अब तुम खबरदार ह्वैजाय ॥
धोखे अनुपी के भूल्यो ना अबहीं सरगदेउँपहुँचाय १७१
खैंचि सिरोही लइ कम्मर से औ ऊदन पर दई चलाय ॥
वार ढालपर ऊदन लीन्ह्यो टोंडर हाथ मूठि रहिजाय १७२
टूटि सिरोही गै टोंडर कै तब मनसोचभयो अधिकाय ॥
ऐँड़ लगायो फिरि बेंदुलके टोंडरपास पहुँच्यो आय १७३
ढाल कि औझड़हनिकै मारयो औ घोड़ाते दियो गिरायं ॥
बाँधिकै मुशकें फिरि टोंडर की लशकरतुरतदीनपहुँचाय १७४
मारु बन्दभै तब हुँवना पर सायंकाल पहुँचा आय ॥
तारागण सब चमकन लागे संतन धुनी दीन परचाय १७५
परे आलसी निज निज शय्या घों घों कण्ठ रहा घरांय ॥