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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 93

४० आल्हाखण्ड । ८८
कौन कहैग तिक्षत्रिनकी ललितपर जात कछूनहिंगायो १५२
पहिले मारुइ भइँ तोपन की पाछे चलनलागि तलवार ॥
पैदरि पैदरि का झुरमुटभा औ असवारसाथ असवार १५३
चारिघरीभरि चली सिरोही बीरन रहे बीर ललकार ॥
भाला बरछिन की मारुइ भइँ कोताखानी चलीं कटार १५४
बड़ी मारुभइ बबुरीवनमाँ जूझनलागि सुघरूवा ज्वान ॥
कटि कटि शिरधरतीपर गिरिगे सबकाछूटिगयोअभिमान१५५
खट खट खट खट तेगा बोलै रणमाँ छपक छपक तलवार ॥
सन सन सन सन गोलीबरसैं खन खन कड़ाबीनकी मार१५६
मर मर मर मर ढालैं बोलैं ठन ठन भालन को झनकार ॥
झल्झल्झल्झल्छूरीझलकैं बोलैं मारु मारु सब मार १५७
मूड़न केरे मुड़चौरा भे औ रुंडन के लाग पहार ॥
कटि भुजदंडैं गईँ क्षत्रिन की कल्लाकटे बलेरन क्यार १५८
रकतकिनदियातहँबहिनिकरीं जूझे बड़े बड़े सरदार ॥
बहे बार तहँ जायँ क्षत्रिन के जैसे नदिया बहै सिवार १५६
गोहैं ऐसी भुजदण्डैं तहँ ढालैं कछुवा सम उतरायँ ॥
छुरी कटारी मछली मानो औ धड़ नैयासमबहिजायँ १६०
काककंक तिन ऊपर बैठे मानो नदिया ख्यलें नेवार ॥
बेटा अनूपी आगे आयो सुरखा घोड़े पर असवार १६१
औ ललकार्यो बघऊदन को ओ द्यावलि के राजकुमार ॥
मेरे सिपाहिन के का पड़हौ ऊदन तोरिमोरि तलवार१६२
बेटा अनूपी की बातें सुनि भा मन खुशी लहुरवा भाय ॥
ऊदन बोले त्यहि क्षत्री ते तुम्हरी अवधिपहुँची आय १६३
पहिले कैले समरभूमि में नाहर टोंडर के सरदार ॥