आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमाड़ोका युद्ध । ८७ ३६
बेटा अनूपी आगे ह्वैकै आयो जहाँ उदयसिंहराय ॥
कहाँ से आयो औ कहँ जैहौ आपनहाल देउ बतलाय १४२
कौन बहादुर अस दुनियाँ माँ जो बबुरीबन रहा कटाय ॥
बेटा अनूपी की बातें सुनि तुरतै ब्वला बनाफरराय १४३
फौज हमारी माड़ो जैहै यहु बनबड़ा घना है भाय ॥
हैं परिमालिक जो मोहबे के जिनकाकही चंदेलाराय १४४
हमतो नौकर तिन घर केरे हमरो नाम उदयसिंहराय ॥
बेटा अनूपी तब समुझायो ऊदन लौटि मोहोबे जाय १४५
इतनी सुनिकै ऊदन बोले क्षत्री मानो कही हमार ॥
घोड़ा पपीहा लाखा पातुरि औ मँगवाउ नौलखा हार १४६
दै पचशब्दा हाथी देवो बिजमा ब्याह देउ करवाय ॥
मूड़ काटिकै नृपजम्बा का हमरी नजरि गुजारो आय१४७
बेटा अनूपी सुनि रिसहा भा औ क्षत्रिन ते कहा सुनाय ॥
जान न पावैं मोहबे वाले टेंटुवाटायर लेउ छिनाय १४८
बेटा अनूपी की बातें सुनि रिसहा भयो बनाफरराय ॥
तुरत दरोगा को ललकार्यो चरखिन तोपैं देउ चढ़ाय १४६
बत्ती दैद्यो मोरि तोपनमाँ इन पाजिन को देउ उड़ाय ॥
सुनिकै बातें बघऊदन की गोलंदाज पहुंचे आय १५०
गोला डारे तिन तोपनमाँ सुम्मा मारैं फेरि चलाय ॥
धरिकै रंजक फिरि प्यालन में ऊपर बत्तीदई लगाय १५१
सवैया ॥
गोलाचले तब ओलासमान मनो घनसावनको चढ़िआयो।
भूमि अकाश न सूझिपरै धुँवना दोउफौजनमें अतिछायो॥
घावपरै बहुहाथिन वाजिन ऊंटन के दलको विचलायो।