आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमाड़ोका युद्ध । ८५ ३७
योंगी पहुँचे त्यहि तम्बू में जहाँ पर रहें देवलदे माय ॥
जितनी गाथा रहै माड़ो की ऊदन सबै गये तहँ गाय ११८
सुनिकै बातें बघऊदन की माता बड़ी खुशी हैजाय ॥
नदी नर्मदा के ऊपर माँ तम्बू बैठि बनाफरराय ११६
ऊदन बोले तहँ आल्हा ते दादा मानो कही हमार ॥
बरह कोस को है बबूरीबन ह्याँपर रहै सदा अँधियार १२०
गम्य सिपाहिन कै नाहीं है ह्याँपर काह करें असवार ॥
हुकुम जो पावैं हम दादा को तौ कटवाय करें उजियार १२१
सुनिकै बातें ये ऊदन की आल्हा हुकुम दीन फर्माय ॥
चला कुल्हाड़ा तब बबुरीबन लागे गिरन वृक्ष अरराय १२२
गा हरकारा तब टोंडरपुर टोंडरमलैं जुहारो जाय ॥
राजा आये हैं मोहबे के ते बबुरी बन रहे कटाय १२३
सुनिकै बातें ब्यटा अनूपी धावन तुरत लीन बुलवाय ॥
जाय नगड़ची ते बोलौ तुम पुरमें डौंडी देय बजाय १२४
खबर नगड़ची सो पावत खन तुरतै डौंडी दीन बजाय ॥
चला दरोगा हाथिनवाला तिनकी साँकरिदीनछुराय१२५
हथी महावत हाथी लैके तिनका जमीं दीन बैठाय ॥
डरी अँबारी तिन हाथिन पर ऊपर हौदा दीन धराय १२६
चांदी हौदा क्यहु हाथी पर सोने कलश धरे सजवाय ॥
डारिकै रस्सा रेशमवाले तिनकोतुरतदीनकसाय१२७
सजिगे हाथी जब टोंडरपुर घोड़ा होन लागि तय्यार ॥
हरियल मुश्की ताजी तुरकी नकुलासब्जाघोंड़अपार१२८
घोड़ा सजिगे सब जल्दी सों तिनपर होन लाग असवार ॥
लाँग चढ़ाये सब धोतिनकी हाथम लिहे ढाल तलवार१२६