आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६ आल्हखण्ड ।
तम्बू गड़िगे सब राजन के झण्डा आसमान फहरायँ ४१
भोर भरहरे मुरगा बोलत जागा कनउज का नरपाल ॥
दिशा फराकत सों छुट्टी करि मज्जनकरतभयोतिहिकाल ४२
पहिरिकै धोती रेशमवाली आसन बैठ चँदेलाराय ॥
संध्या करिकै त्यहि अवसर की औ जपमाली लीन उठाय ४३
मन्त्र गायत्री को जपिकै फिरि तर्पण करन लाग महराज ॥
अक्षत चन्दन धूप दीप औ लै पकवान शम्भु के काज ४४
भोग लगायो शिवशङ्कर को ध्यायो रामचन्द्र को नाम ॥
फिर बुलवायो तिन बिप्रन को जिनके जपै तपै का काम ४५
गऊ मँगायो पैंतालिस फिर ब्याई एक बेर की जोन ॥
बछरा नीचे हैं जिनके फिरि सोने सींग मढ़ी हैं तौन ४६
खुरौ मढ़े हैं जिन चांदी के पीठ म परीं बनातन झूल ॥
पूँछ पकरिकै तिन गौवन की राजा दानदेत मनफूल ४७
भूसा दाना एकमास को बिप्रन घरे दीन पहुँचाय ॥
जायकै पहुँच्च्यो फिरि मंदिरमें यकईस बिप्रनलीन बुलाय ४८
दही दूध औ पेरा बरफी चटनी भांति भांति तय्यार ॥
भोजन दीन्ह्यो तिन बिप्रन को राजा कनउजका सरदार ४९
सीध मँगायो पैंतालिस फिर औरे बिप्रन लीन बुलाय ॥
सहित दक्षिणा के दीन्ह्यो सो राजा बड़ा प्रेम मनलाय ५०
ऐसो दान नित्यप्रति देवै राजा बिप्रन घरै बुलाय ॥
पाछे भोजन आपौ करिकै तब दरबार पहुँचै जाय ५१
ऐसो दानी महाराजा यहु राजा कनउज का सरदार ॥
जायकै पहुँच्च्यो तिहि मंदिरमाँ जहँपर भरीलाग दरबार ५२
आवत देख्यो जब राजा को ठाढ़े भये शूर सरदार ॥