आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
पृष्ठ 83, कुल 618 में से
संदर्भ में पढ़ें३० आल्हखण्ड । ७८
हम सुखपावैं इन योगिन सँग चाहौ भीख मागिकै खायँ ३५
सतयीं बोली का तुम बोलो जो यह लिखा होत कर्त्तार ॥
हमहूं होइत क्यहु योगी घर तब ये होते मोरि भतार ३६
अठयीं बोली का तुम बोलो याही लिखा रहै कर्त्तार ॥
नैनन देखै मन सों मोहै ताको जानो पूर भतार ३७
नवयीं बोली का तुम बोलो तुम्हरे खाउँ पूत औ भाय ॥
तुम्हरे सबके ई पति होवैं हमका कौन दई लैजाय ३८
दशयीं बोली तब रिस करिकै राँड़ो अबना करो चवाउ ॥
देखो तमाशा तुम योगिन का बातन काह घरे लैजाउ ३६
सुनिकै बातैं त्यहि दशयीं की सखियां सबै गईं शरमाय ॥
जितनी नारी गढ़माड़ो की सो योगिन पर गईं लुभाय ४०
दिह्यो रुपैया केहु योगिन का केहू दीन मोतिन का हार ॥
रानी कुशला वैरागिन को तुरतै दीन नौलखाहार ४१
चलिभे योगी तब महलन ते फाटक ऊपर पहुँचे जाय ॥
बेटी बिजैसिनि तहँ जल्दी सों ऊदन पास पहुँची आय ४२
पकरिकै बाहू दोउ ऊदन की औ यह बोली बचन सुनाय ॥
मैं पहिचानति त्वाहिं ऊदन है नाहक डारयो मूड़ मुड़ाय ४३
योगीके बालक तुम आहिवना आहिव देशराज के लाल ॥
जल्दी चलिदे अन्वरे महलन में नाहीं तोर पहुँचा काल ४४
सुनी बिजैसिनि की ई बातें बोला तुरत लहुरखा भाय ॥
कहँना दीख्यो तुम ऊदन का साँचे हाल देउ बतलाय ४५
सुनिकै बातें बघऊदन की बोली तुरत बिजैसिनि बैन ॥
अभई लड़का जो माहिल का देखा तासु ब्याह में नैन ४६
हमहूं न्याते गईं सिरउँज माँ तहँ तुम गये बराती भाय ॥