आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमाड़ोका युद्ध । ७७ २६
पूँछन लागी तब बेटी ते काहे बदन गयो कुँभिलाय २३
रूप देखिकै इन योगिन का उरमें गई दया फिरि आय ॥
मात पिता बारे ते मरिगे तब इन डारे मूड़ मुड़ाय २४
ठाढ़े सोचों मैं मनमें यह तबलों पाँव रपटिगा माय ॥
डारि तमाखू बीरा लायूं ताते योगी गिरा भहराय २५
पाप न लावो कछु मन अपने माता सत्य दीन बतलाय ॥
सुनिकै बातें ये बिटिया की मनमाूसत्य समझिगैमाय २६
रानी बोली फिरि योगिन ते अब तुम करो तमाशा भाय ॥
सुनिकै बातें ये रानी की नाचन लाग लखुरवाभाय २७
गावन लागे मलखाने तब धुरपद सरंगीत औ ख्याल ॥
धनि धनि माता इनकी कहिये ऐसा कहन लगीं सबबाल २८
एकते दूसरी बोलन लागी हमरी सुनो सखी तुम बात ॥
बालम हमरे जो ये होवैं ऐसो बिधी बनावै नात २९
बैठि बिजनिया इनके ढोरैं मुख में सखी खवावैं पान ॥
सुफल जन्म आपन हम मानैं मानो सखी बचन परमान ३०
तीसरि बोली फिरि आली सों आली करो बचन ममकान ॥
रूप उजागर सब गुणआगर योगीसकलगुणनिकेखान ३१
हमहूँ मोहिन इन योगिन पर मानो सखी बचन तुम साँच ॥
धड़कै आली म्वरि छाती अब औजरिहिनबिरहकीआँच३२
चौथी बोली का तुम बोलो हमरे लगे करेजे बान ॥
तीखे नैना हैं योगिन के मानो अबै उतारे शान ३३
पँचयीं बोली का तुम बोलो सखियो सबै गइउ बौराय ॥
कबहुँक पावैं हम पलँगा पर तौ बैकुण्ठ धामको जायँ ३४
छठयीं बोली फिरि सखियन सों हमनिज जियकी देयँबताय ॥