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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 81

२८ आल्हखण्ड । ७६
देखि तमाशा ले योगिन का जामें जन्म सुफल है जाय ११
सुनिकै बातें महरानी की बाँदी चढ़ी अटापर धाय ॥
स्ववत जगायो सतखंडापर बाँदी बार बार शिरनाय १२
तुमहिं बुलायो कुशला रानी जल्दी चलो हमारे साथ ॥
सुनिकै बातें ये बाँदी की नायो रामचन्द्र को माथ १३
लैके डिब्बा पानन वाला कई इक वीरा लीन लगाय ॥
दुइ इक खाये मुख अपने माँ दुइ इक लीन्हे हाथ चपाय १४
चलिभै बेटी फिर अंटा ते सीढ़िन उतरि तरे गै आय ॥
रानी कुशला के महलन में बेटी तुरत पहुँची जाय १५
बीरा दीन्ह्यो बैरागिन को सो ऊदन ने डरा चबाय ॥
रूप देखिकै बघऊदन का मूर्च्छितगिरी धरणिभहराय १६
नैन बाण ऊदन के लागे सोऊ गिरे मूर्च्छा खाय ॥
देखि तमाशा रानी कुशला तुरतै गई सनाका खाय १७
योगी नाहीं तुम भोगी हौ औ छल किह्यो यहाँपर आय ॥
जल्दी बाँदी जा ड्योढ़ी पर औ करियाका लाउ बुलाय १८
बाँधिकै मुशकें सब योगिन की औ कोल्हू माँ दरों पिराय ॥
देखिविजयसिनियोगीगिरिगा यहिका पेट दरों चिरवाय १६
भुसा भरावों यहि पेटेमाँ अपने महल देउँ टँगवाय ॥
इतना सुनिकै मलखाने फिरि बोले तुरतै बचन बनाय २०
छोटो योगी जो मरिहैं है महलन आगि देउँ लगवाय ॥
डारि तमाखू वीरा लाई सो योगीका दिह्यो खवाय २१
पीक लीलिगा बारो योगी मुूर्च्छा खाय गिरा भहराय ॥
लै जल छिनकन मलखे लागे तबजगि परा लहुरखाभाय २२
बेटी विजैसिनि उठि ठाढ़ी भै रानी गोद बैठिगै जाय ॥