आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमाड़ोका युद्ध । ७५ २७
छूटि सुमिरनी गै देवनकै शाका सुनो शूरमन क्यार ॥
रानी कुशला के महलन में योगी बने बैठि सरदार ५
अथ कथाप्रसंग ॥
रानी बोली तब योगिनते हमको भजन सुनावो गाय ॥
सुनिकै बातें ये रानी की सय्यद खँझड़ी लीन उठाय १
लइ इकतारा मलखे ठाढ़े आल्हा डमरू रहे घुमाय ॥
बजै सरंगी भल देवाकै झुकिकुकिनचैउदयसिंहराय २
ता ता थे ई ता ता थे ई मलखे हाथन रहे बताय ॥
भाव बतावै कमर झुकावै थिरकति फिरै लहुरवाभाय ३
कबौं बँसुरिया धरि ओठनमाँ ऊदन बहुत निकारै राग ॥
देखि तमाशा सब योगिन का रानी बड़ा कीन अनुराग ४
मोती मँगायो फिरि थाराभरि औ योगिनका दीन दिवाय ॥
भरिकै मूठी तिन मोतिन का सूंघन लाग लहुरवा भाय ५
कौन रूख माँ ई उपजंत हैं रानी हमैं देउ बतलाय ॥
सुनिकै बातें ये ऊदन की रानी मनै रही पछिताय ६
कौन तपस्या खंडित ह्वैगै बारे डार्यो मूड़ मुड़ाय ॥
मोती समुंदर में पैदा हैं केहू रूख न लागैं भाय ७
सुनिकै बातें ये रानी की ऊदन मोती दीन फैलाय ॥
हीरा मोती जो हम बाँधैं मारग लेवैं चोर छिनाय ८
रानी मल्हना मोहबे वाली त्यहि दै डरयो नौलखाहार ॥
तैसि निशानी जो ह्याँ पावैं योगी खुशी होयँ तब द्वार ६
सुनिकै बातें ये योगिन की रानी कहा वचन हर्षाय ॥
करो तमाशा तुम महलन में तुमको हार देउँ मँगवाय १०
बेटी बिजैसिनि है अंटापर रूपा बाँदी लाउ बुलाय ॥