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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 79

२६ आल्हखण्ड । ७४
महल तुम्हारे जो कछु पावैं लै कै हरद्वार को जायँ ॥
शंका लावो कछु मनमें ना साँचे हाल दीन बतलाय १५३
सुनिकै बातैं ये योगिन की रानी कुर्सी लीन मँगाय ॥
बैठे कुर्सिनमाँ योगी तब मन में श्रीगणेश पद ध्याय १५४
करों तरंग यहाँ सों पूरण तवपद सुमिरि भवानी कन्त ॥
पारलगायो रघुनन्दन मोहिं कीन्होरूपफेरि भगवन्त १५५
इति श्रीलखनऊ निवासि (सी, आई, ई) मुंशी नवलकिशोर आत्मज बाबू
प्रयागनारायणजी की आज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गत पँडरीकलां
निवासि मिश्रवंशोद्भव बुधकृपाशङ्करसूनु पं० ललिताप्रसादकृत
योगिरानी गृहप्रवेशो नाम द्वितीयस्तरंगः २ ॥
सवैया ॥
श्रुति शत्रुलसैं नितअंगनमें मन भंगकरैं पथदेखि कुचाला ।
रक्षक सोयगयो नँदलाल बिहाल करै सबको कलिक्राला ॥
बस एकचलैनहिं दीनदयाल बिना तब ध्यानधरे सुरपाला ।
शरण गये ललिते निबहै औ मिटै सबही मनके भ्रमजाला १
सुमिरन ॥
तोहिं भवानी मैं ध्यावतहौं शारद बैठु कण्ठमें आय ॥
भूले अक्षर जो कछु होवैं करगहि देवो कलम लिखाय १
गदका उठिगा भीमसेन बिन अर्जुन बिना हिराने बान ॥
पोथी उठिगै भइ सहदेव बिन अब को बाँचै वेद पुरान २
पुण्य न रहिगै कहूँ कलियुगमाँ सबके मनै समान्यो पाप ॥
सुखी न देखा हम काहूको सबके चढ़ी रहै नित ताप ३
विधवा नारी घर घर देखी घर घर जुदे बाप सों पूत ॥
नहीं वीरता क्यहू में देखी देखे बड़े बड़े रजपूत ४