आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२ आल्हखण्ड । ७०
बड़ी देर भइ हत्यारी तोहिं कात्वरिअकिलगईहिराय १०६
क्यहिके महलन में यटकीरहि सांची सांचु देइ बतलाय ॥
सुनिकै बातें महरानी की बांदीहाथजोरिशिरनाय १०७
कही हकीकति सब योगिनकै शोभा बार बार गयगाय ॥
कीतो आये इन्द्रलोक ते की वै गये स्वर्ग ते आय १०८
शोभा बरणै को योगिनकै रानी कही बूत ना जाय ॥
सुनिकै बातें ये बांदी की तुरतैहुकुम दीन फरमाय १०६
जल्दी लावो तुम योगिनको दर्शन मोहिं देउ करवाय ॥
मोरि लालसा यह डोलति है योगीजायँ महलमेंआय ११०
सुनिकै बातें ये रानी की बांदी चली हवा के साथ ॥
मता अनूपी के महलन में योगिनजायनवायोमाथ १११
कह्यो हकीकति सब रानी की बांदी बार बार शिरनाय ॥
मता अनूपी तब बोलत भै योगीचरणशीशनवाय ११२
घर घर मांगे कछु बनिहैना कुशलामहल चले तुम जाउ ॥
बहु धन पैहौ त्यहि महलन में बैठे चहौ जन्मभर खाउ ११३
जैसी औषधि रोगी चाहै बैदन तैसी दई बताय ॥
बड़ी खुशाली भै ऊदन के जनुमिलिगयोबापकादायँ ११४
चले पछोड़ी सब योगी फिरि बांदी चली अगाड़ी जाय ॥
को गति वरणै तिन योगिनकै जनु गे देवलोक ते आय ११५
सवैया ॥
देखत योगिन रूप अनूप चले नर नारि सबै पुर केरे ।
आये मनो मघवापुरते यह बात करैं वै सबै मिलिकेरे ॥
हेरे तेई नहिं फेरे फिरैं बड़भाग कही जे रहे कोउ नेरे ।
योगिन योगिन भेष लखैं ललिते ते कहैं बड़भागहैं मेरे ११६