आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमाड़ोका युद्ध । ७१ २३
रय्यत मोही गढ़ माड़ो की काहू धरा धीर ना जाय ॥
पहिली ड्योढ़ी योगी पहुँचे बांदी बोली शीश नवाय ११७
तनुकबिलामिजाउतुमड्योढ़ीपर भीतर खबर सुनावों जाय ॥
सुनिकै बातें ये बांदी की योगी ठाढ़ भये हरियाय ११८
घोड़ पपीहा तहँ बांधो थो हाथी खड़ा महोबे क्यार ॥
देखिकै दोऊ रोवनलागे आल्हाछाँड़िदीनडिंडकार ११९
देखि तमाशा ऊदन बोले आल्है बार बार शिरनाय ॥
काहे रोये तुम ददुवां हौ सांचे हाल देउ बतलाय १२०
सुनिकै आल्हा बोलन लागे हमरे सुनो लहुरवा भाय ॥
हाथी घोड़ा दोउ मोहबे के इनका देखि मोहगाआय १२१
सुनिकै बातें ऊदन बोले दादा हुकुम देउ फरमाय ॥
हाथी घोड़ा दोउ लैजावैं औ फौजनमें पहुँचैं जाय १२२
सुनिकै बातें मलखे बोले ऊदन अकिल गई हेराय ॥
चोरी चोराते लै जैहौ कलियुग चोर कहैहौ जाय १२३
दाग लागि जाय रजपूती माँ औ सब क्षत्रीधर्म नशाय ॥
वादिन लीन्ह्यो हाथी घोड़ा जादिनलिह्योबापका दायँ १२४
तबलों बांदी दौरत आई योगिन माथ नवायो आय ॥
आगे बांदी पाछे योगी दूसरे फटक पहुँचे जाय १२५
तहँना बिरवा रह बरगदका छाया घनी रही तहँ छाय ॥
योगी बैठे त्यहि छाया में मनमें श्रीगणेशको ध्याय १२६
देशराज औ बच्छराज ये दोऊ भाय बनाफरराय ॥
पत्थर कोल्हुन में पिरवायो जम्बै पूत करिंगाराय १२७
खुपड़ी टाँगी त्यहि बरगद में औरन बोलि बोलि रहिजायँ ।
लड़का हैगे बैरागी हैं कोधौं ल्यई हमारो दायँ १२८