आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमाड़ोका युद्ध । ६६ २१
को गति वरणै तहँ योगिन कै शोभा कही बूत ना जाय ६४
लिहे बांसुड़ी सबसों आगे सनमुख गयो उदयसिंहराय ॥
बायें हाथ सों कीन वन्दगी मन में ध्याय शारदामाय ६५
देखिकै तुरतै राहूट द्वैगा जम्बै माड़ो का सरदार ॥
सनमुख ठाढ़े त्यहि योगी को गरुई हांक दीन ललकार ६६
कउने गँवारे के चेला हौ योगिउकियो शत्रु का काम ॥
जउने हाथ सों जपै सुमिरनी जउने लेयँ रामको नाम ६७
करै वन्दगी हम त्यहि सों ना यह फिरि कह्यो बनाफरराय ॥
सुनिकै बातें बघऊदन की राजा मनै गयो शरमाय ६८
मता अनूपी नृप जम्बा की तहँ पर गई रहै तब आय ॥
शोभा लखिलखि सो योगिनकै मनमाँ बड़ी खुशी है जाय ६६
औ फिरि बोली यह योगिनसों तुम्हरी योग सिद्धि है जाय ॥
चलिकै नाचो म्वरे महलन में योगेश्वरै कृष्णको ध्याय १००
सुनिकै बातें ये रानी की महलन तुरत पहुँचे जाय ॥
मलखे लीन्हे इकत्तारा को सय्यद खँझरी रहे बजाय १०१
बजै सरंगी भल देवा कै आल्हा डमरू रहे घुमाय ॥
बजै बांसुरी बघऊदन कै थिरकन लाग लँहुरवा भाय १०२
टप्पा ठुमरी भजन रेखता धुरपद बिहंगड़ो कल्यान ॥
जयजयवन्ती औ तिल्लाना तोरै ग़ज़ल पर्ज पर तान १०३
भाव बतावै सब अँगुलिन सों यहु द्यावलि को राजकुमार ॥
ता ता थे ई ता ता थे ई कबहूं निकरै शब्द अपार १०४
रानी कुशला की बाँदी तहँ देखै सबै काम बिसराय ॥
एक पहरते दुइ लग बीते तीसरपहरू गयोनगच्याय १०५
बाँदी गमनी तब महलन को देखत रानी उठी रिसाय ॥