आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२० आल्हाखण्ड । ६८
कहाँ ते आयो औ कहँ जइहौ आपन भेद देउ बतलाय ८४
सुनिकै बातें दरवानी की बोला तुरत बनाफरराय ॥
हमतो आवैं बङ्गालेते आगे हिंगलाज को जायँ ८५
करब याँचना हम महलन में फाटक हमैं देउ खुलवाय ॥
सुनिकै बातें ये योगिन की बोला द्वारपाल हर्षाय ८६
खबरि सुनावैं महाराजा को तुमसे कहैं फेरि हम आय ॥
कहि हरकारा यह दौरतभा ड्योढ़ी तरे पहुँचा जाय ८७
बेटा अनूपी का जम्मानृप ताको खबरि सुनाई जाय ॥
आये योगी हैं द्वारे पर शोभा कही बूत ना जाय ८८
सवैया ॥
देख म पाँच लखइमाँ सांच सुनो नृप यांचि यही हम चाहें।
पाँच के साथ मिले हम सांच पवैं बर यांचि अबैं अवगाहें ॥
देश बिदेश लखे नहिं पांच जो रूप में सांच सचे सच आहें।
सांच कभी ललिते नहिं यांच चहै दशपांच मनै अरसाहैं ८६
सुनिकै बातें हरकारा की बोला माड़ो का सरदार ॥
जल्दी लावो तुम योगिन को शोभा लखी तासु की द्वार ६०
सुनिकै बातें महाराजा की धावन चला तड़ाका धाय ॥
खबरि सुनाई सब योगिन को लय दरबार पहुँचा जाय ६१
बइसपर्त की गुदड़ी लीन्हे ज्यहिमाँ परी ढाल तलवार ॥
कुंडल सोहैं भल कानन में शिरपर टोपी करै बहार ६२
सोहैं सुमिरनी कर दहिने में आल्हा डमरू रहे बजाय ॥
बजै सरंगी भल देवा कै सय्यद खँझरी रहा उड़ाय ६३
कर इकतारा मलखे लीन्हे ऊदन बंशी रहे बजाय ॥