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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 72

[Header] माड़ोका युद्ध । ६७ १६

रक्षा करिहैं बिसमिल्ला जी करिहैं खुदा खैर यहि बार ७२
पायं लागिकै महतारी के योगी बने उदयसिंहराय ॥
छोड़ि आसरा जिंदगानी को औ सब मयामोह बिसराय ७३
पहिरिकैगूदड़ीआपनिआपनि चारो भाय बनाफरराय ॥
पहिरिकै गुदड़ी बनरस वाला खँझड़ीआपनिलीनउठाय ७४
पाँचो चलिभे गढ़माड़ो को गावतपर्ज और ध्वनि ख्याल ॥
भाइ लहुरवा थिरकति जावै बेटा देशराज को लाल ७५
को गति बरणै तिन योगिनकै हमरे बूत कही ना जाय ॥
बबुरीबनके बाहर ह्वैकै माड़ो तरे पहुँचे आय ७६
बजै सरंगी भल देवाकै सय्यद खँझरी रहा बजाय ॥
कर इकतारा मलखाने के आल्हा डमरू रहे घुमाय ७७
ध्वनि सुनि डमरूकै खँझड़ीतहँ तामें मिलै तुरतही आय ॥
डमरू ध्वनि में इकतारा मिलि औ सारँगि को रहा बुलाय ७८
चारो मिलिकै इकमिल ह्वैकै पाँचो शब्द पहुँचै जाय ॥
शब्द मिलावै द्यावलि वालो यहु आल्हाकलहुरवाभाय ७९
को गति बरणै बघऊदन कै गावै गीत छतीसो राग ॥
बड़ी भक्तिभय कृष्णचंद्रमें पूरो भयो तहाँ अनुराग ८०
बाहू दोऊ फरकन लागीं नैना अग्नि बरण होजायँ ॥
देबी शारदाको ध्यावतभो यहु आल्हाकलहुरवाभाय ८१
अईं शारदा उर ऊदन के औ सब हाल दीन बतलाय ॥
बड़ी खुशहाली भय ऊदन के जाना मिला बापका दाँय ८२
तब तो थिरकै भल गलियन में फाटक तरे पहुँचा जाय ॥
अलख जगावै शब्द सुनावै योगिन धूनी दीन रमाय ८३
तब दरवानी बोलन लागे बाबा मतलब देउ बताय ॥