आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४ आल्हखण्ड ।
बरके लायक संयोगिनि है काके संग बियाही जाय १७
यहै सोचिकै मन राजाने तुरतै पण्डित लीन बुलाय ॥
सइति बताओ अब जल्दी सों जामें रचा स्वयम्बर जाय १८
सुनिकै बातें महाराजा की पण्डित साइति दीन बताय ॥
मन्त्री बैठ रहे पासैमाँ राजै हुकुमदीन फर्माय १६
न्यवत पठावो सब राजन को कनउज साजि करो तय्यार ॥
हुकुम पायकै महाराजा को मन्त्री तुरत भयो हुशियार २०
उठि सिंहासन सों ठाढ़ो भो राजा कनउज का सरदार ॥
किह्यो पैलगी सब विप्रन को क्षत्रिन कीन्ह्यो राम जुहार २१
ब्राह्मण क्षत्री गे अपने घर महलन गयो चंदेलाराय ॥
आवत दीख्यो जब राजा को बांदी चली तड़ाका धाय २२
खबरि सुनाई महरानी को महलन आवत कन्त तुम्हार ॥
सुनिकै बातें ये बांदी की रानी तुरत भई हुशियार २३
आगे ठाढ़ी भइ द्वारे पर राजा अटे बराबरि आय ॥
पहिले राजा गे मन्दिर को पाछे चली आपहू जाय २४
पौढ़्यो पलँगा पर महाराजा आपौ बैठि चरण ढिग जाय ॥
हरुये हरुये दोउ हाथन सों दोऊ लीन्ह्यो पैर उठाय २५
सो धरि राख्यो निज गोदी में औ छाती में लिह्यो लगाय ॥
चापन लागी धीरे धीरे सोवन लाग चंदेलाराय २६
आपौ सोई महाराजा सँग मनमें रामचन्द्र को ध्याय ॥
भोर भवरहरे पह फाटत खन पक्षी रहे सबै चिल्लाय २७
मन्त्री जागा महाराजा का लीन्ह्यो द्वारपाल को टेरि ॥
जल्दी लावो कोतवाल को यामें करो कछू ना देर २८
सुनिकै बातें ये मन्त्री की चलिभो द्वारपाल शिरनाय ॥