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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 6

संयोगिनिस्वयम्बर । ३
जामा पहिरे रेशमवाला आला कनउज का सरदार ५
पाग बैंजनी शिरपर सोहै तापर कलँगी करै बहार ॥
कवि औ पण्डित बहु बैठे हैं भारी लाग राजदर्बार ६
नचै पतुरिया सन्मुख ठाढ़े ओढ़े काश्मीर कै सारि ॥
जूरा झलकै त्यहि सारी बिच काली नागिनिके अनुहारि ७
फूल चमेलिन के जूरा में नखतन सरिसकरैं उजियारि ॥
हरवा सोहै गल बेलाका छैला ताको रहे निहारि ८
बालाहालैं त्यहि कानन में गालन छुवै और टरिजाँय ॥
अद्भुत बेसरि स्वहै नाक में शोभा कही तासु ना जाय ६
डुलरी तिलरी पंचलरीलों सो गलबिच में करैं बहार ॥
बाजू सोहैं दोउ बाहुन में जोशन शोभाअमित अपार १०
सोहैं कलाइन में ककना भल तामें चुरियाँ करैं बहार ॥
छल्ला सोहैं त्यहि अँगुरिन में ताको क्षत्री रहे निहार ११
सोने करगता तीन लरनको सो कम्मर में करै बहार ॥
कड़ा के ऊपर छड़ा बिराजैं तापर पायजेब झनकार १२
पैर जमावै कमर झुकावै अँगुरिन भाव बतावति जाय ॥
जौनि रागिनी जब वाजिबहै ताको तबै देय दर्शाय १३
जब दिशि जावति है राजाके पावै द्रव्य जाय हर्षाय ॥
माफी पाये है कनउज में लरिकातीनिसखिलौंखाँय १४
लाग अखाड़ा रजपूतन का शोभा कही बूत ना जाय ॥
खाये अफीमन के गोला बहु पलकैं मूंदैं औ रहिजाँय १५
उड़ै तमाखू बुटवल वाली धुवना सरग रहा मड़राय ॥
भाँग जमाये बहु बैठे हैं मनमाँ रहे रामयश गाय १६
त्यही समइया त्यहि अवसरमाँ राजै गयो सोच मनछाय ॥