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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 69

१६ आल्हखण्ड । ६४
धर्‍यो नगाड़ा फिरि सँड़ियापर भादों मेघ अस हहराय ३६
बोलि दरोगा घोड़े वाला चांदी कड़ा दीन डरवाय ॥
हुकुम लगायो बघऊदन ने सबियाँ घोड़ सवाँरो जाय ३७
बूढ़ो दुर्बल रोगी घोड़ा एको नहीं किह्यो तय्यार ॥
कच्छी मच्छी ताजी तुरकी हरियलमुश्की घोड़अपार ३८
लक्खा गर्रा पँचकल्यानी सुर्खा सुरँगा रंग विरङ्ग ॥
देर लगावो अब तनको ना घोड़ेनजायकसो सब तङ्ग ३६
सुनिकै बातैं बघऊदन की दौरत चला दरोगा जाय ॥
जितने घोड़ा घोड़शारे माँ सबिसँवेगि लीन कसवाय ४०
हथी महावत हाथी लैके तिनका करन लाग तैयार ॥
अंगद पंगद मकुना भौंरा छोटे पर्वत के अनुहार ४१
मैनकुंज मलिया धौरागिरि औ भौंरागिरि दीन विछाय ॥
धरिकै सीढ़ी सांखो वाली हाथी सजैं महावत धाय ४२
डारि बिछौना मखमल वाले ऊपर हौदा दीन धराय ॥
हिरा बिराजैं अम्बारेन में शोभा कही बूत ना जाय ४३
बारह कलशा सोने वाले हौदा ऊपर करैं बहार ॥
यक यक हाथी के हौदा पर दुइ दुइ शूर भये असवार ४४
बोलि दरोगा तोपन वाला रुपिया मुहरैं दई इनाम ॥
बड़ि बड़ि तोपैं जल्दी साजो जासों होय हमारो काम ४५
सुनिकै बातैं मलखाने की दौरत चला दरोगा जाय ॥
कुवाँ सुखावनि गर्भ गिरावनि चर्खी ऊपर दीन चढ़वाय ४६
सूर्य्य लपकानि चन्दझपकनि बिजुली तड़पनि लीन मँगाय ॥
मेघगरज्जनि अष्टधातु की गोला एक मना को खाय ४७
तोप संकटा औ लछिमिनियाँ भैरौं तोप लीन मँगवाय ॥