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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 70

माड़ोका युद्ध । ६५ १७
पहिया दुरकैं तिन तोपन के धसकतिचलीं रसातल जायँ ४८
को गति बरणै तिन तोपनकै कायर देखि देखि सकुचायँ ॥
शूर सिपाही ईजति वाले मनमाँ बड़े खुशी द्वैजायँ ४९
ऊदन बोले तब लश्कर में हमरे सुनो सिपाही भाय ॥
जिन्हें पियारी हों घरतिरिया दोहरी तलब लेयँ घरजायँ ५०
जिन्हें पियारा हो रणलोहा जूझै चलैं हमारे साथ ॥
सुनिकै बातें बघऊदन की क्षत्रिन नाय रामको माथ ५१
हाथ जोरिकै सब बोलतभे मानो कही बनाफरराय ॥
पाँउँ पछारी को डारै ना बहुतनधजीधजीउड़िजाय ५२
सुनिकै बातें रजपूतन की बोला द्यावलि क्यार कुमार ॥
स्याबसि स्याबसि ओ रजपूतो कलियुग रखिहौ धर्महमार ५३
भीलमबखतरपहिरि सिपाहिन हाथ में लीन ढाल तलवार ॥
रणकी मौहरि बाजन लागी रणका होनलाग ब्यवहार ५४
ढाढ़ी करखा बोलन लागे बिप्रन कीन वेद उच्चार ॥
चढ़ा कबूतरी पर मलखाने ऊदन बेंबुलपर असवार ५५
घोड़ करिलिया आल्हा बैठे सिरगा बनरस का सरदार ॥
बैठ मनोहरा की पीठीपर देवा भीषम केर कुमार ५६
पहिल नगाड़ा में जिनबन्दी दुसरे फाँदि भये असवार ॥
तिसर नगाड़ाके बाजत खन लश्करचलिभासाठिहजार ५७
आगे आगे तोपैं चलिभैं पाछे चले मस्त गजराज ॥
घंटा बाजैं गर हाथिन के मानो कोपकीन सुरराज ५८
खर खर खर खर कै रथ दौरैं चह चह धुरी रहीं चिल्लाय ॥
चला रिसाला घोड़नवाला ताकी शोभा कही नाजाय ५६
सत्रह दिनकी मैजलि करिकै माड़ो धुरा दवायनि जाय ॥
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