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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 68

माड़ोका युद्ध । ६३ १५
मल्हना रानी के महलन में तुरतै गये बनाफरराय २६
हाथ जोरि औ बिनती कैकै बोला बचन उदयसिंहराय ॥
जावैं माता हम माड़ो को आयसु आपु देउ फरमाय २७
मोहिं आज्ञा महराजा की माया आपु देउ बिसराय ॥
दाया करिकै म्वरे बालक पर माता हुकुम देउ फरमाय २८
सुनिकै बातें ये ऊदन की रानी गई सनाकाखाय ॥
काह विधाता की मरजी है ऐसो कहै लहुरखा भाय २९
यहै सोचिकै मन अपने मा औ सूर्यनको शीश नवाय ॥
मल्हना बोली बघऊदन ते हमरे सुनो बनाफरराय ३०
बिटिया बनियां की आहिन ना जो रण सुनिकै जायँ डेराय ॥
जौनि आज्ञा महराजा की आयसु स्वई बनाफरराय ३१
सवैया ॥
जावहु पूत लड़व गढ़ माड़व आवो जीति यही हम चाहैं।
सिंहिनि मातु नहीं मन सोच सदा यह वेद पुराणहु काहैं ॥
धर्म कि मारग जेई चलैं सुख तेई सदा जग में निरबाहैं।
बाप तुम्हार हन्यो करिया ललिते त्यहि मारो तबै सुखलाहैं ३२
बातें सुनिकै ये मल्हना की बोले तुरत बनाफरराय ॥
आठ महीना की मुहलत दे नवयें चरण पूजिहौं आय ३३
वादा सुनिकै बघऊदन का मल्हना बिदा कीन हर्षाय ॥
पाँचो चलिभे फिरि महलन ते औ लश्कर में पहुँचे आय ३४
तुरत नगड़ची को बुलवायो सय्यद बनरस का सरदार ॥
बजै नगाड़ा अब मोहबे मा सबियाँ फौज होय तय्यार ३५
हुकुम पायकै सो ताल्हन को दौड़त चला नगड़ची जाय ॥