सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

पृष्ठ 66, कुल 618 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 66

मांडोका युद्ध । ६१ १३
सय्यद सुमिरखो बिसमिल्ला को मलखे सुमिरख्यो नन्दकुमार २
बिंध्यबासिनी आल्हासुमिरख्यो देबा रह्यो रामपद ध्याय ॥
देवी शारदा मइहरवाली सुमिरनलाग लहुरवाभाय ३
चरण शरण में हम तुम्हरी हैं दाया करो शारदामाय ॥
जीति कै अइहौं जो माड़ो ते सोने छत्र चढ़ैहौं आय ४
लज्जा राख्यो ओ महरानी मैं हौं सदा तुम्हारो दास ॥
नहीं भरोसा निज भुजबलका केवल एक तुम्हारी आस ५
ध्याय शारदा को ऊदन फिरि दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥
किह्यो दण्डवत महरानी की जो गाढ़े मा होयँ सहाय ६
ऊदन बोल्यो फिरि आल्हा सों दादा मानौ कही हमार ॥
क्षण क्षण बीतै जो मोहबे मा सो हम जानैं वर्ष हजार ७
जल्दी चलिये राजभवन में जहँ पै बैठि रजापरिमाल ॥
बिदा मांगिकै महाराजा सों दादा चलन चही ततकाल =
सुनिकै बातें बघऊदन की आल्हा लीन ढाल तलवार ॥
उठिकै ठाढ़े भे जल्दी सों सँगमें बनरसका सरदार ६
सभामें पहुँचे परिमालिक की पाँचो ठाढ़ भये शिरनाय ॥
बोले आल्हा सों परिमालिक काहे खड़े बनाफरराय १०
सुनिकै बातें परिमालिक की आल्हा कही हकीकत गाय ॥
भई लहुरवा यहु बिगराहै माड़ो लेई बापका दाँय ११
सुनिकै बातें ये आल्हा की राजा गयो सनाकाखाय ॥
बोलि न आवा परिमालिकसे मुँहका बिरा गयो कुम्हिलाय १२
बड़ी उदासी मुखपर छाई शिरसों गिरा छत्र भहराय ॥
सोचनलाग्योपरिमालिकफिरि मन ना कछू ठीक ठहराय १३
बहुतसोचिकैपरिमालिक फिरि बोल्यो सुनो उदयसिंहराय ॥