आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
पृष्ठ 65, कुल 618 में से
संदर्भ में पढ़ें१२ आल्हखण्ड । ६०
सवैया ॥
तव पद प्रेम बढ़ायों नितै अब जावों कहाँ मोहिं देहु बताई ।
सूझत और न ठौर कहूं तजिकै तव चरणन की सेवकाई ॥
भाई औ बन्धु सहाई कोऊ नहिं देखि परो तुमहीं रघुराई ।
ललिते अबआशनिराशकरै क्यों भूलिगयों प्रभुकी प्रभुताई १
सुमिरन ॥
रामको ध्यावों औलछिमनको बेटा अंजनि को हनुमान ॥
वालि के अंगद तुमका ध्यावों लंका किह्यो घोर घमसान १
मान न राख्योक्यहुंनिशचरको रोप्यो पैर सभा में जाय ॥
मेघनाद सम कोटिन योध तुमहरो पैर न सके हिलाय २
दानिन ध्यावों बलि हरिचन्दै कुंतीपुत्र करण सरदार ॥
इन्द्रहुआये ज्यहि द्वारे में औ यश सुनिकै परमउदार ३
अब मैं ध्यावों सुत गंगा को भीषम जौन शूर सरदार ॥
टारि प्रतिज्ञा दीन कृष्णकी करिकै बड़ी भयंकर मार ४
कहौं सपूती शिरीकृष्ण की जिन गोबर्द्धन लीन उठाय ॥
सात दिनोंलौं मेघा बरसे झम २ हहरि २ हहराय ५
बई कँगुलियांपर गिरिधारे ठाढ़े रहे कृष्ण महराज ॥
लाज रखैया सोइ स्वामी हैं हमपर कृपाकरैं ब्रजराज ६
छूटि सुमिरनी गय देवन कै शाकासुनो शूरमन क्यार ॥
ऊदन जैहैं गढ़माड़ो को हैहैं फौज सबै तय्यार ७
अथ कथाप्रसंग ॥
मुर्गा बोले सब गांवन में पक्षी जागिपरे त्यहि काल ॥
शब्द चहचहा बोलन लागे जागा मोहबे का नरपाल १
आल्हा ऊदन मलखे देवा जागा बनरस का सरदार ॥