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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 64

माड़ोका युद्ध । ५६ ११
सवैया ॥
जय जय देव मनावत तोहिं औ ध्यावतहउँ मैं गरीवनिवाजा ।
बदला पितुकोज्यहिभांति मिलै सोकरो बिभुदेवनहोय अकाजा ॥
भक्ततुम्हार उदयसिंह ठाढ़ सो आयसु काह मिलय महराजा ।
यहिभांति अनेकनबारकह्योशिरनायरह्यो ललितेनिजकाजा १०४
अस्तुति कीन्ह्यो मलखाने ने देबा ज्वरे खड़ा दोउहाथ ॥
पूजा कीन्ह्यो भल आल्हाने पाछे धरा चरणपर माथ १०५
मन्दिर बाहर सैयद ठाढ़ो सोऊ ध्यायरहा मनमांझ ॥
चरि चरि गौवें घरका डगरीं औ द्वैगई तहांपर सांझ १०६
उड़ि उड़ि पक्षी गये बसेरन नखतन कीन तहाँ उजियार ॥
पूजाकरिकै सब बिधिवतसों तहँते चलत भये सरदार १०७
जायकै पहुंचे निज महलन में नयनन गई नींद अतिछाय ॥
मलखे देबा आल्हा ऊदन सोये रामचन्द्र को ध्याय १०८
सैयद सुमिरयो बिसमिल्ला को नाहर बनरस का सरदार ॥
बिकट निशाकी ये बातें हैं ज्वानो मानो कही हमार १०६
योगी जागैं सब आनंद सों चोरन बड़ी खुशी भै आय ॥
माथ नवावों श्रीगणेश को औ रट राम राम मनलाय ११०
दोउ पद बन्दौं पितु अपने के जिन मोहिं विद्या दीनपढ़ाय ॥
स्वर्ग में बैठे सो सुख भोगैं सेवक कहै नित्त यशगाय १११
सब अभिलाषा पूरी हैगै आशा रही राम के पाँय ॥
आगे फौजें मोहबे सजिहैं माड़ो जई बनाफरराय ११२
इतिश्री लखनऊनवासि (सी,आई,ई) मुंशी नवलकिशोरात्मज बाबू
प्रयागनारायणजीकी आज्ञानुसारउन्नावप्रदेशान्तर्गत पँडरीकलां
निवासि मिश्रवंशोद्भव बुधकृपाशंकरसूनु पं०ललिताप्रसादकृत
ऊदनमातासंवादेप्रथमस्तरङ्गः १ ॥