आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२ आल्हखण्ड ।
ब्राह्मण कायथ मुसलमान ओ नौकर रहे बहुत अँगरेज ॥
काम देखिकै सब काहू को सोवैं नवल भवन तब सेज ४
को गति बरणै तिन मुंशीकै जिनको बढ़ो अमित परताप ॥
लाखन पुस्तक के ऊपरमाँ जिनके परै अबौलौग छाप ५
तिन सुत बाबू प्रागनरायण जिन मन शान्ति रही दर्शाय ॥
को गुण बरणै तिन बाबूके गाये कथा बहुत बढ़िजाय ६
छं० जिला जौन उन्नाम तासु पूरबदिशि माहीं ।
पांच कोस है ग्राम नाम पँड़री तिहिकाहीं ॥
किरपाशंकर मिश्र वृत्ति पण्डित की जाहीं ।
तिनसुत ललितेनाम ग्रन्थ निर्मापक आहीं ७
ते यश बरणैं अब जयचंद का लै कै रामचन्द्र का नाम ॥
प्रथम स्वयम्बर संयोगिनि का पाछे बरणौं युद्ध ललाम ८
सबकनवजियात्यहिकनउजमाँ बीचम बसै तहाँ नरपाल ॥
छूटि सुमिरनी गै ह्यांते अब सुनिये कनउज केर हवाल ६
अथ कथाप्रसंग ॥
जयचंद राजा कनउज वाला आला सकल जगत सिरनाम ॥
को गति बरणै त्यहिमंदिरकै सोहै सोन सरिस त्यहिधाम १
केसरि पोतो सब मंदिर है औछति लागि बनातन केर ॥
सुवा पहाड़ी तामें बैठे चकस गड़े बुलबुलन केर २
लाल औ मैनन कै गिनती ना तीतर घूमि रहे सब ओर ॥
पले कबूतर कहुँ घुटकत हैं कहुँ कहुँ नाचि रहे हैं मोर ३
लागि कचहरी है जयचंद के बैठे बड़े बड़े नरपाल ॥
बना सिंहासन है सोने का तामें जड़े जवाहिग लाल ४
तामें बैठो महराजा है दहिने धरे ढाल तलवार ॥