आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६ आल्हखण्ड । ५८०
हुकुम सुनावा महराजा का सत्रियाँ हाल कहा समुझाय १६५
लौटिकै मोर्चा ते आवब जब तुम्हरो करब मनोरथ आय ॥
ऐसे कहिकै ताहर नाहर चलिभे बहुत भांनिसमुझाय १६६
आये फ़ौजन में रण नाहर डंका तुरत दीन बजवाय ॥
बाजत डंका अहर्तंका के लश्कर कूच दीन करवाय १६७
चढ़ि दलगंजन की पीठि मा मनगा श्रीगणेश पद ध्याय ॥
बन्दन कीन्ह्यो पितु चरणन का चन्दन अक्षत फूल चढ़ाय १६८
प्राण निछावरि फिरि मनते करि चलिभा दिल्ली राजकुमार ॥
गर्जत तर्जत लर्जत आवत नाहर दिल्ली का सरदार १६६
आयकै पहुँचा समर भूमि मा गरुई हाँक कहा ललकार ॥
लेय चँदेला अब अधकर को आयो दिल्ली राजकुमार १७०
सुनिकै बातें ये ताहर की बेला मोहवे का सरदार ॥
असल जनाना मर्दाना जो ठाना समर आय त्यहिवार १७१
पहिले मारुइ भइँ तोपन की पाछे चलन लागि तलवार ॥
सब हथियारन में तलवारी याही धर्मरूप अवतार १७२
आरयसाही जे उत्साही गाही धर्म युद्ध के यार ॥
तौन सिपाही बेपरवाही छाँड़े प्राण आशा त्यहिवार १७३
तड़ तड़ तड़ तड़ तड़ तड़काटैँ पाटैँ मुण्डन भूमि अपार ॥
मुरि २ गिरि २ लरि २ कितन्यो जूझन लागि शूरसरदार १७४
झम् झम् झम् झम् भाला वरसैँ तरसैँ घाव देखि जिययार ॥
भम् भम् भम् भम् क्षत्री भमकैँ चमकैँ चमाचम्मतलवार १७५
गम् गम् गम् गम् ढोलक गमकैँ दमकैँ शक्ति शूल विकराल ॥
मारु मारु कै मौहरि बाजै बाजै हाव हाव करनाल १७६
जूझे क्षत्री दुहुँ तरफ़ा के नदिया बही रक्त की धार ॥