आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[Header] बेलाताहरकामदान । ५७६ १५
इतना सुनिकै ताहर चलिभे दोऊहाथजोरिशिरनाय १५३
हुकुम लगायो फिरि लश्करमें तुरतै सजन लागि सरदार ॥
झीलमबखतर पहिरिसिपाहिन हाथम लई ढालतलवार १५४
सजे बछेड़ा ताजी तुर्की मुश्की घोड़ भये तय्यार ॥
लक्खा गर्रा पचकल्यानी सुर्खा सिर्गाआदि अपार १५५
डारि रकाबै गंगा यमुनी आननदीन लगाम लगाय ॥
हथी महाउत हाथी लैके तिनका दीन भूमि बैठाय १५६
धरी अँवारी तिन हाथिन पर बहुतन हौदा दीन धराय ॥
चुम्बक पत्थर के हौदा हैं जिनमेंसेलबलौंचाखाय १५७
कोउ कोउ हाथी इकइन्ता हैं कोउ दुइदन्त श्वेत गजराज ॥
यकमिलबैके सब चिंघरत हैं मानो कोपकीन सुरराज १५८
सजिगैं फौजैं दल बादल सों ताहर गये मातु के धाम ॥
हाल बतायो सब अगमा सों करिकैचलिभादण्डप्रणाम १५९
प्यारी अपनी के महलन में ताहर गये तड़ाका धाय ॥
बैठा ठाकुर जब शय्यापर दैया बिपति कही ना जाय १६०
राह कटावै मंजारी तहँ होवै छींक तड़ातड़ आय ॥
झंझा वायू डोलन लागी आयूगईजनोनगच्याय १६१
बादल छायो आसमान में कउँधालपकिलपकिरहिजाय ॥
चमकै बिजुली त्यहि समया मा दमकै आसमान हहराय १६२
थर थर थर थर थर थर कंपै झंपै आसमान त्यहिकाल ॥
दर दर दर दर दर दर दरकै फरकैनहिनअंगत्यूहिकाल १६३
मरणहि सूचित भो पत्नी को ननँदी वचन गये ठहराय ॥
उठीतड़ाका लखि अशकुनको प्रीतम गरे गई लपटाय १६४
ताहर रोंक्यो त्यहि समया मा अपनी माया मोह भुजाय ॥