आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबेलाकेगौनेकाद्वितीययुद्ध । ५५५ . ९३
ब्याह बनाफर ऊदन कीन्ह्यो लाखनिबिदालीनकरवाय१२६
काह हकीकति है ताहर कै डोला पास जाय नगच्याय ॥
जितने सँगमा तुम लै आये सब के मूड़ लेउँ कटवाय१३०
तौ तौ लरिका रतीभान का नहिं ई मुच्छ डरों मुड़वाय ॥
जीवन चाहौ ताहर नाहर तौ अब कूच जाउकरवाय१३१
सुनिकै बातें ये लाखनि की ताहर बोले बचन सुनाय ॥
मारो मारो ओ रजपूतो डोला लेवो तुरत छिनाय १३२
सुनिकै बातें ये ताहर की तुरतै चलन लागि तलवार ॥
एक सहस दल पैदल सेना दुइशतबीससाथअसवार १३३
अभिरै क्षत्री अरझारा सों बाजै छपक छपक तलवार ॥
मारे मारे तलवारिन के नदिया बही रक्तकीधार १३४
को गति बरणै तहँ ताहर कै नाहर दिल्ली का सरदार ॥
पैदल सेना धुनकत आवै मारत अवै घोड़ असवार १३५
यहु दलगंजन की पीठी मा सोहै दिल्ली का सरदार ॥
जहँ पर भूरी है लाखनि कै ताहर आयगयो त्यहिबार१३६
ऐंड़ लगायो दलगंजन के हौदा उपर पहूंचा जाय ॥
गुर्ज चलाई लाखनिराना मस्तक परी घोड़ेकेआय १३७
हटि दलगंजन तब दलतेगा बलते थहर थहर थर्राय ॥
जितनी सेना थी ताहर की तुरतै भागिचली भर्राय १३८
ताहर हटिगे जब मोर्चा ते लाखनि कूचदीन करवाय ॥
बाजत डंका अहलंका के निर्भयजात कनौजीराय १३६
बेला बोली तहँ ऊदन ते साँची कहौ बनाफरराय ॥
दायज दीन्ह्यों का महराजा हमते साँच देउ बतलाय १४०
सुनिकै बातें ये बेला की कुण्डल तुरत दीन दिखलाय"