आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२ आल्हखण्ड । ५०
निमक न खावे जो रवि दिनमें एकै बेर करै आहार ॥
बंधन छूटैं त्यहि दुनिया के नाँघै माया सिंधु अपार ३
सोय के जागै जब कोऊ नर लेवै रोज सूर्य्य के नाम ॥
जब मरजावै वहु दुनिया में पावै तुरत सूर्य्य को धाम ४
छूटि सुमिरनी गै सूर्य्यन कै औ ऊदन का सुनो हवाल ॥
ऊदन जैहैं गढ़माड़ो को लड़िहैं तहाँ केर नरपाल ५
अथ कथाप्रसंग ॥
बरस बारहीं का ऊदन रहै बाँधे सबै ज्वान हथियार ॥
माहिल ठाकुर उरई वाला खेलै ताकी बाग शिकार १
घोड़ बेंदुला तहँ थिरकत भा विषधर उरई के मैदान ॥
भारी पनिघट रहै उरई का नारिन दीख सजीला ज्वान २
धीरज छूट्यो तब नारिन के बोलीं एक एक के कान ॥
काहू राजाको बालकहै याको रूप दीन भगवान ३
नारी बोलैं अस आपस में तवलग गयो बनाफर आय ॥
ऊदन बोल्यो पनिहारिन सों घोड़ै पानी देउ पियाय ४
सुनिकै बातैं बघऊदन की बोली एक नारि रिसिआय ॥
कौनदेश के रहवैया हौ आपन नाम देव बतलाय ५
लौंड़ी तुम्हरी हम आहिनना घोड़ै पानी देयँ पियाय ॥
माहिलराजा जो सुनि पैहैं लेहैं घोड़ा तुरत छिनाय ६
देश हमारो नगर मोहोबा आल्हा केर लहुरवाभाय ॥
बेटा आहिन देशराज के हमरो नाम उदयसिंहराय ७
यह कहि लीन्हों कर गुलेलको गुल्लन गगरी दीन गिराय ॥
जितनी गगरी रहैं पनिघटमाँ सबियाँ गुल्लन दीन नशाय ८
पैंड़ा मसक्यो रसबेंदुल के घोड़ा उड़ा हवा सम जाय ॥