आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
DevanagariHindipublished618 पृष्ठ
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अथ आल्हखण्ड ॥
माड़ो का युद्ध वर्णन ॥
सवैया ॥
श्वेतस्वरूप अनूपमनूप नहीं कोउ रूप कहौं ज्यहि गाई ।
आप समान हौ आपहि रूप स्वरूप के भूप गिरीश जमाई ॥
बैल बुढ़ान कि शूल हिरानभयो कछु आन कि आनहि भाई ।
पापी लस्यो ललिते शरणागत लूटत हैं त्यहि चोर सदाई १
काम औ क्रोध औ लोभौ मोहहु लूटत हैं नितही दुखदाई ।
राव न रंक कि शंक करें निरशंक फिरैं सबके उर जाई ॥
चार में मार अपार बली जो छली छलि देश गयो सब खाई ।
पापी लस्यो ललिते शरणागत लूटत हैं त्यहि चोर सदाई २
सुमिरन ॥
नित प्रति ध्यावै जो सुर्यन को होवै जौन बिसूरै काज ॥
सूर्य्य महातम जो कउ गावै ताकी बनी रहै जग लाज १
प्रातःकाल उदय पूरब दिशि पश्चिम अस्त शामको जान॥
देय अंजली जल सुर्यन को तापर खुशी होयं भगवान २
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