आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६ आल्हखण्ड । ५४८
घढ़ा बनाफर उदयसिंह जब हमरी लूट लीन करवाय ४५
तंगी आई जब हमरे घर तब दरबार जुहारा भाय ॥
महिना कमती कछु लेहैं ना तुमते साँच दीन बतलाय ४६
इतना सुनिकै चौंड़ा चलि भा आयो जहाँ पिथौराराय ॥
खबरि गँजरिहन की बतलाई चौंड़ा बार बार समुझाय ४७
खबरिपायकै पिरथी बोले मानो कही चौंड़ियाराय ॥
कहाँ खजाना घर इतना है देवैं तीस लाख जो भाय ४८
पारस पत्थर चन्देले घर तिनकी करें नौकरी जाय ॥
म्वहिं अभिलाषा नहिं नौकरकी देवैं तीस लाख जो भाय ४६
इतना सुनिकै चौंड़ा बोला मानो कही पिथौराराय ॥
बड़े लड़ैया गाँजर वाले मोहवा आपु लेउ लुटवाय ५०
दश औ पन्द्रा दिन नौकरकरि करिये काज पिथौराराय ॥
फिरि मन भावै महराजा के दीजै सब के नाम कटाय ५१
यह मन भायी पृथीराज के तुरतै हुकुम दीन फरमाय ॥
हुकुम पिथौरा को पावत खन हिरसिंहविरसिंहलीनबुलाय ५२
लाखनि ऊदन दोऊ आये चेहरा अर्पन दीन लिखवाय ॥
कीन नौकरी घर पिरथी के क्षत्री गये शहर में आय ५३
हुकुम लागिगा यह पिरथीका हाथी घोड़ा देउ दगाय ॥
सुनिकै बातें महराजा की लाखनिबहुुतदीनसमुझाय ५४
लिखी न हिंसा कहुँ बेदन में गीता पाठ कीन अधिकाय ॥
विनय हमारी यह राजन है यहु मंसूख हुकुम हैजाय ५५
नहीं फायदा कछु याते है ओ महराज पिथौराराय ॥
सुनिकै बातें ये लाखनि की खारिज हुकुम दीन करवाय ५६
लाखनि ऊदन देवा सय्यद धनुर्वा यई पाँचहू ज्वान ॥