आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबेलाकेगौनेकाद्वितीययुद्ध । ५४७ ५
कारो बाना कार निशाना सबकोड करें आज सरदार १३
बने गँजरिहा सबदल हमरो दिल्ली हेतु होय तय्यार ॥
मैं अब जावतहौं तहँना पर जहँना कनउज के सरदार ३४
इतना कहिकै ऊदन चलिभे तम्बुन फेरि पहुँचे आय ॥
सम्मत करिकै लखराना सों उत्तर पत्र दीन पठवाय ३५
लाखनिऊदन मिलि आल्हाते फौजै तुरत लीन सजवाय ॥
भई तयारी फिरि दिल्ली की लश्कर कूच दीन करवाय ३६
पाँच सात दिन के अरसा मा दिल्ली शहर गये नगच्याय ॥
दिल्ली केरे फिरि डाँड़ेमा परिगे जाय कनौजीराय ३७
चौंड़ा बकशी त्यहि समयामा तम्बुन पास पहुँचा आय ॥
मिले बनाफर तहँ ऊदन जब पूँछन लाग चौंड़ियाराय ३८
कहाँ ते आयो औ कहँ जैहौ आपन हाल देउ बतलाय ॥
सुनिकै बातें ये चौंड़ा की बोला तुरत बनाफरराय ३९
हिरसिंह विरसिंह हम विरियाके गाँजर देश हमारो जान ॥
सुनी नौकरी घर बेलाके आयनकरन स्वईहमज्वान ४०
इतना सुनिकै चौंड़ा बोला ठाकुर बचन करो परमान ॥
काह दरमहा तुम चाहत हौ हमसे सत्य बतावो ज्वान ४१
हम बतलावें दिल्लीपतिको नौकर तुम्हें देयँ करवाय ॥
करो नौकरी जो औरत की तौ रजपूती धर्म नशाय ४२
इतना सुनिकै ऊदन बोले नाहर साँच देयँ बतलाय ॥
एकलाख ते कम नहिं लेवैं यहु नितखर्च हमारो आय ४३
देय महीना तीसलाख को ताकी करें नौकरी भाय ॥
बारह बरस हमते लरिकै जयचंद कूचदीन करवाय ४४
दीन न पैसा हम कनउजका सो यश रहा जगत में छाय ॥