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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 547

४ आल्हखण्ड । ५४६
आल्हा ऊदन मलखे सुलखे कलियुग धर्मध्वजासरदार २१
इनकी कीरति अतिपवित्र है जो कोउ देखै हृदय उघार ॥
परम पवित्र चरित्र जिनके हैं तिनके नाम लेय संसार २२
यहतो ललिते कै ध्वनि बोलै खोलै और हाल यहिवार ॥
पाती लैकै धावन चलिभा पहुँचा नगर मोहोवादार २३
विपदा छाई ह्याँ मोहवे में कोउन मसा सरिस भुन्नाय ॥
यहि गति देखी द्वारपाल ने ठाढ़े लोग रहे सन्नाय २४
चुप्पे चलिभा दशहरिपुर का जहँ पर बैठि बनाफरराय ॥
पाती दीन्ही तहँ धावन ने ठाकुर उदयसिंह को जाय २५
चुप्पे पाती ऊदन पढ़िकै तुरतै डरी तड़ाकाफार ॥
आल्हाठाकुर तब बोलत भे साँचे धर्म्मरूप अवतार २६
कहाँ कि पाती यह आई थी डारी जौनि तड़ाकाफार ॥
बातें सुनिकै ये आल्हा की बोले उदयसिंह सरदार २७
अड़वड़ पाती थी बेला की गड़बड़ लिखी दुःखकेभार ॥
जो नहिं जावैं हम दिल्ली को बेला देय बहुत धिक्कार २८
आयसु पावैं हम दादा को जावैं युक्ति सहित यहिवार ॥
जो नहिं जावैं हम दिल्ली को हमरे जीवे को धिक्कार २६
सुनिकै बातें आल्हा बोले मानो कही लहुरवा भाय ॥
तुम नहिं जावो अब दिल्लीको चहु मरि जाय चँदेलाराय ३०
दोष न देई कउ दुनिया मा ब्रह्मा लीन्ह्यो पान छिनाय ॥
अबहीं भूले त्यहि वघऊदन कैसी कहै लहुरवाभाय ३१
सुनिकै बातें ये आल्हा की बोले उदयसिंह सरदार ॥
दूधपियायो बालापन में मल्हना कीन बड़ा उपकार ३२
कैसे जैवे हम दिल्ली ना दादा जियत मोहिं धिक्कार ॥