आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
पृष्ठ 537, कुल 618 में से
संदर्भ में पढ़ें८ आल्हाखण्ड । ५३६
पावैं पिछाड़ी का डाखो ना यारो राख्यो धर्म हमार ॥
मारो मारो ओ रजपूतो देहैं विजय अवश्य करतार ७०
इतना कहिकै ब्रह्मा ठाकुर लाग्यो करन आप तलवार ॥
ब्रह्माठाकुर के मुर्चा मा कोउ न ठाढ़ होय सरदार ७१
जैसे भेड़िन भेड़हा पैठै जैसे अहिर बिडारै गाय ॥
तैसे मारे ब्रह्मा ठाकुर रणमा कोउ न रोकै पायँ ७२
ब्रह्माठाकुर के मारुन मा कोऊ शूर नहीं समुहाय ॥
लश्कर भाग्यो पृथीराज का पायो विजय चंदेलेराय ७३
त्यही समैया त्यहि औसर मा माहिल उरई का सरदार ॥
लिल्ली घोड़ी पर चढ़ि बैठ्यो तिकतिककरनलागत्यहिवार७४
जहाँ कचहरी पृथीराज की भारी लाग राज दरबार ॥
उतरिकै घोड़ीते भुइँ आवा पहुँचा उरई का सरदार ७५
आवत दीख्यो जब माहिल को राजा कीन बड़ा सत्कार ॥
आवो आवो उरई वाले माहिल राजा हितू हमार ७६
इतना कहिकै महराजा ने अपने पास लीन बैठाय ॥
'माहिल बोले त्यहि समया मा मानो कही पिथौराराय ७७
लड़िकै जिनिहौ ना ब्रह्माते चहुवल देयँ तुम्हें करतार ॥
धाँधू चौंड़ा सब कोउ हारे जीता पूतु चंदेले क्यार ७८
बड़े लड़ैया मोहबेवाले उनके बांट परी तलवार ॥
उड़न बछेड़ा जिनके घर मा तिनते लड़ै कौन सरदार ७९
पिस्थी बोले तब माहिल ते ठाकुर उरई के सरदार ॥
कौन उपाय करैं यहि औसर ज्यहिमा विजयदेयँकरतार ८०
इतना सुनिकै माहिल बोले ओ महराज पिथौराराय ॥
रूप जनाना करि ताहर का डोला आपु देउ पठवाय ८१