आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[Header] बेलाकेगौनेकाप्रथमयुद्ध । ५३५
को गति बरनै जगनायक कै मारे घूमि घूमि तलवार ॥
ब्रह्मा ठाकुर के मुर्चा मा कोउ न ठाढ़ होय सरदार ५८
लरिका मरिगे पृथीराज के क्षत्रिन छाँड़ि दीन मैदान ॥
धाँधू चौंड़ा त्यहि समया मा भारी कीन घोर घमसान ५६
भा खलभल्ला औ हल्लाअति लल्ला डारि भागि हथियार ॥
ना मुहँ फेरैं दिल्ली वाले ना ई मोहबे के सरदार ६०
कीरति प्यारी के भूखे हैं दोऊ दिशिमा परम जुझार ॥
फिरि फिरि मारैं औ ललकारै यहु मल्हना को राजकुमार ६१
घोड़ा मारै भल टापन ते ऊपर आप करै तलवार ॥
ब्रह्माठाकुर के मुर्चा मा क्षत्री डारि भागि हथियार ६२
देखि तमाशा चौंड़ा धाँधू रहिगे चुप्प साधि त्यहि बार ॥
यहु निरशंकी परिमालिक का बहुतन पठै दीन यमद्वार ६३
रण अभिलाषा नहिं काहू के सब कउ गये मनैमन हार ॥
ठाकुर बेढब जगनायक है मैने जौनु चँदेले क्यार ६४
धाँधू ठाकुर के मुर्चा मा दूनों हाथ करै तलवार ॥
चौंड़ा ब्राह्मण इकवन्ता से बीरन रहा तहाँ ललकार ६५
रोज केतकी कहुँ फूलै ना चंपा रोज न लागै डार ॥
गई जवानी फिरि मिलिहै ना ना फिरि रोजचलै तलवार ६६
कीरति जैहै सब दुनिया मा जो कउ लड़ै शूर सरदार ॥
आखिर देही यह रहि है ना जोरी जोरन जोर हजार ६७
सदा न फूलै यह बन त्वरई यारो सदा न सावन होय ॥
सदा न पैहौ यह नर देही यारो सदा न जीवै कोय ६८
ऐसा बोल चौंड़ा कहि कहि क्षत्रिन दीन्हे खूब जुझाय ॥
ब्रह्मा ठाकुर त्यहि समया मा भारी हाँक कहा गुहराय ६६