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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 508

नदीबेतवाकासमर । ५०७ १५
शंक नहीं निरशंक फिरै यहु बंक है ठाकुर ठीक बखाना ।
काह बखान करै ललिते गुणवान जहान यही हम जाना १५२
बड़ा प्रतापी रणमण्डल मा ठाकुर उदयसिंह सरदार ॥
बहु दलमारा पृथीराज का नदिया बही रक्तकी धार १५३
मारत मारत दल बादल के तब लखिपरे वीर चौहान ॥
बिषधर शायक इक हाथेमा इक लोहेकी गहे कमान १५४
तहँईं दीख्यो लखराना को तब मन ठीक लीन ठहराय ॥
शब्द भेद शर हनै पिथौरा कैसे बचै कन्नौजीराय १५५
जो मरिहैं लाखनि राना तौ सब जैहैं कामनशाय ॥
जो सुनि पैहैं तिलका रानी तौ मरिजाएँ जहरकोखाय १५६
नहीं आसरा यह लाखनि का जो अब धरैं पछारी पायँ ॥
शूर शिरोमणि सबविधि साँचे हमरे मित्र कन्नौजीराय १५७
साम दाम अरु दण्ड भेद ये चारों अङ्ग नीतिके आयँ ॥
इनसों लड़िकै सज्जन क्षत्री पावैं विजय समरमें जाय १५८
यहै सोचिकै ऊदन क्षत्री आपन घोड़ दीन दौराय ॥
जहँपर हाथी पृथीराज का ऊदन अटा तड़ाका धाय १५९
हाथ जोरिकै ऊदन बोले ओ महराज पिथौराराय ॥
तुम्हें मुनासिब यह नाहीं है जैसी करो समर में आय १६०
ना चढ़ि आये जयचँद राजा ना चढ़िआये राजापरिमाल ॥
राजा राजा का रण सोहै मानो साँच बात नरपाल १६१
लड़िका लाखनि तुम्हरे आगे तिन पर कैसे गहौ कमान ॥
बातें सुनिकै बघऊदन की रहिगा चुप्प साधि चौहान १६२
ऐंड़ लगावा फिरि बेंदुल के हौदा ऊपर पहुँचाजाय ॥