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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 507

१४ आल्हखण्ड । ५०६
छाँड़े मोर्चा भागति आवैं औरौ परे नजरि सब आय ॥
दह्या बापू की ध्वनि लागी कोऊ पाँव घसीटनजाय १४२
बिना हाथ के कोऊ आवै कोऊ रोवै घाव दिखाय ॥
हाय ! गोसइयाँ दीनबन्धुकहि कोऊ सज्जन रहे मनाय १४३
यह गति दीख्यो जब क्षत्रिनकै बोले तुरत बनाफरराय ॥
सय्यद चाचा तुम बतलावो कहाँपर छूटि कनौजीराय १४४
जो कछु हैहै लाखनि जियका सबके मूड़ लेव कटवाय ॥
इतना सुनिकै सय्यद बोले मानो कही बनाफरराय १४५
तीनिसै हाथी के हलकामा अक्सर परे कनौजी जाय ॥
प्राण आपने लय हम भागे मानो कही बनाफरराय १४६
नहीं आसरा लखराना का तुमते साँच दीन बतलाय ॥
सात लाखलों फौजैं लै कै आवा आप पिथौराराय १४७
शब्द पायकै हनै निशाना त्यहिते कौन आसराभाय ॥
सुनिकै बातें ये सय्यद की ऊदन गये सनाकाखाय १४८
धनुवाँ बोला तब सय्यद ते चलिये फेरि समरको भाय ॥
हमका तुमका जयचंदराजा सौंपा रहै कनौजीराय १४९
सम्मुख जाते महाराजा के सय्यद जियत मौत है जाय ॥
इतना सुनिकै सय्यद लौटे मोर्चा गहा तड़ाका आय १५०
धनुवाँ आयो फिरि मोर्चा मा औरौ शूर गये सब आय ॥
तीनिसै हाथीके हलका मा पहुँचा तुरत बनाफरराय १५१
सवैया ॥
लाखनि खोज करें बघऊदन नाहिं मिलय कहुँ ठौर ठिकाना।
कूदत फाँदत मारत धावत आवत डंक बजाय निशाना॥