आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनदी बेतवा का समर । ४६७ ५
चढ़ा पिथौरा सात लाख सों सबियाँ घाट दये रुकवाय ॥
जो तुम लड़िहौ है चाकर सँग तौ रजपूती धर्म नशाय ३४
इतना सुनिकै लाखनि बोले चौंड़ा काहगये बौराय ॥
किरिया कीन्ही हम गंगा में चलिबे साथ बनाफर राय ३५
पाँउँ पिछारी का डरिबे ना चहुतन धजी धजी उड़िजाय ॥
चुवै निशाकर ते आगी चहु औ नभ मिलै धरणि में आय ३६
उवै दिवाकर चहु पश्चिम को सातौं सूखि समुन्दर जायँ ॥
लाखनि भागैं नहिं नदिया ते चौंड़ा साँच दीन बतलाय ३७
इतना सुनिकै जरा चौंड़िया तुरतै दीन्ही ढाल चलाय ॥
होउ बहादुर जो लखराना हमरी ढाल लेउ उठवाय ३८
लाखनि बोले तब धनुवाँ ते लावो ढाल यार यहिबार ॥
दाबि बछेड़ा धनुवाँ चलिभा धाँधू कहा बचन ललकार ३६
पाँउँ अगाड़ी को डारे ना नहिं मुहुँ धाँसि देउँ तलवार ॥
बात न मानी कछु धाँधू की धनुवाँ घोड़े का असवार ४०
भाला धमका धाँधू ठाकुर धनुवाँ लैगा वार बचाय ॥
ढाल उठाई जब धनुवाँ ने स्याबासिकह्यो कनौजी राय ४१
लीन कटारी लाखनि राना औ रेतीमा दीन चलाय ॥
होय बहादुर जो दिल्ली को सो अब लेय कटार उठाय ४२
इतना सुनिकै भूरा चलिभा सय्यद उठा तड़ाका धाय ॥
तब ललकारा वहि भूराने सय्यद खबरदार है जाय ४३
कहा न माना कछु भूरा का सय्यद लीन कटार उठाय ॥
सो दैदीन्ही लखराना का चौंड़ा बहुत गयो शरमाय ४४
झुके सिपाही दुहुँ तरफा के फिरितहँ चलन लागि तलवार ॥
पैदल पैदल के बरणी मै औ असवार साथ असवार ४५
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