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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 499

६ आल्हखण्ड । १४८
मूँड़ि लपेटा हाथी भिड़िगे अंकुश भिड़े महौतन क्यार ॥
गजके हौदाते शर बरषैं नीचे करैं महाउत मार ४६
कटि कटि कल्ला गिरैं खेतमा घायल भये सुघरुआ ज्वान ॥
नदी बेतवा के डांडेपर लाखनि चौंडाका मैदान ४७
दाब्यो लश्कर लखराना का लाग्यो होन भड़ाभड़ मार ॥
भागि सिपाही दिल्लीवाले अपने डारि डारि हथियार ४८
चौंडा बाम्हन औ लाखनिका परिगा समर बरोबरि आय ॥
तीर चौंडिया तकिकै मारा लाखनि लैगे वार बचाय ४६
तुरतै भूरी को दौरावा चौंडा पास पहुँचे जाय ॥
भाला मारा लखराना ने हाथी गिरा पछाराखाय ५०
तुरत चौंडिया पैदल हैगा तब यह कहा कनौजीराय ॥
पायँ पियादे को मारैं ना हाथी और लेउ मँगवाय ५१
इतना कहिकै लाखनिराना आगे दीन्ही फौजबढ़ाय ॥
बाजे डंका अहतक के हाहाकार शब्द गा छाय ५२
सुर्चा हटिगा जब चौंडा का धावन तबै पहुँचा जाय ॥
सुनि हरिकारा की बातैं सब ताहर बेटा लीन बुलाय ५३
हुकुम लगावा महराजा ने तुम चढ़िजाउ नदीपर धाय ॥
हुकुम पिथौरा का पावतखन डंका तुरत दीन बजवाय ५४
सजा रिसाला घोड़न वाला आला तीनि लाखलों भाय ॥
कच्छी मच्छी ताजी तुर्की हरियल सुर्ख परैं दिखराय ५५
को गति वर्णैं तहँ सिरगनकी मिरगन चाल चलेसब जायें ॥
हंस चालपर पँचकल्यानी मुश्की मोरसरिस दिखरायें ५६
लवा कि चालन ताजी जावैं हरियल चलैं कबूतर चाल ॥
कच्छी कच्छपकी चालनमा मच्छी मगरमच्छकी चाल ५७