आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनदीबेतवांकासमर । ५६५ ३
ऊदन बोले तब लाखनि ते हमरे बचन करो परमान ॥
संग कनौजी हमहूं चलिबे करिबे घोर शोर घमसान १०
मान न रखिबे क्यहु क्षत्री के तुम्हरे संग कनौजी ज्वान ॥
ऊदन लाखनि के मुर्चा ते जैहैं लौटि बीर चौहान ११
इतना सुनिकै लाखनि बोले मानो उदयसिंह सरदार ॥
रतीभान का मैं लड़काहूं नाती बेनचकवै क्यार १२
काह हकीकति हैं दिल्लीपति जो तुम चलो संगमें ज्वान ॥
भूरी हथिनी कछु बूढ़ी ना ना कछु असारोग बलवान १३
संग न लेबे हम काहू को आल्हा बचन करब परमान ॥
इतना कहिकै लाखनि ठाकुर नदी हेतु कीन प्रस्थान १४
धनुवाँ तेली मीरा सय्यद येऊ भये साथ तय्यार ॥
नदी बेतवा के पाँजर मा पहुँचा कनउजका सरदार १५
नौसै हाथी लखरानाके पानी पियनगये त्यहिकाल ॥
पार उतरिगे ते नदी के सहिनहिंसकेघाम बिकराल १६
तब हरिकारा पृथीराज का चौंड़ै खबरि जनाई जाय ॥
बहुतक हाथी पार आयगे मानों कही चौंडियाराय १७
इतना सुनिकै चौंड़ा बाम्हन अपनो हाथी लीन मँगाय ॥
चढ़ा तड़ाका फिरि हाथीपर नदी उपर पहुँचा आय १८
सबियाँ हथिनी लखराना की चौंड़ा तुरत लीन खिदवाय ॥
भगे महाउत सब तहँना ते आये जहाँ कनौजीराय १६
हाल बताइने सब हाथिनका ज्यहिविधिचौंड़ालीनखिदाय ॥
सुनि संदेशा लाखनिराना डंका तुरत दीन बजवाय २०
भारी लश्कर लखराना का गर्जति चला समरको जाय ॥
घरी मुहूरत के अरसा मा पहुँचे समरभूमि में आय २१